पास आ मैं तिरे शाने पे सर रख लूँ
ख़ुद को मैं दर्द से कुछ बे-ख़बर रख लूँ
है अगर तेरे हिस्से में भी कोई ग़म
ला मुझे दे उसे भी मैं इधर रख लूँ
चाय की चुस्कियों में राहतें ढूँढ़े
और बातों में मीठी सी शरर रख लूँ
जिस ने हर मोड़ पर धोखा दिया हो तो
कैसे मुमकिन है अपना मानकर रख लूँ
ये सड़क गर तुझे बेहद सताती है
तो तू आ जा तुझे मैं अपने घर रख लूँ
ये ग़ज़ल यूँ मुकम्मल हो ज़रा 'अनवर'
इस मुलाक़ात को मैं मुख़्तसर रख लूँ
— Sibgatullah Anwer















