पुर-सुकूँ और ख़ुशी को भूल गया
जो बशर बे-ख़ुदी को भूल गया
प्यास के चलते मरने वाला था
प्यास बुझते नदी को भूल गया
घर में तब घर किया अंधेरे ने
जब दिया रौशनी को भूल गया
जो खड़ा साथ वक़्त-ए-उलझन में
वक़्त सुलझा उसी को भूल गया
क्या है मानी सफ़र का जब राही
मंज़िल-ए-आख़िरी को भूल गया
ज़ोर और ज़ुल्म में फॅंसा बंदा
तेरी मौजूदगी को भूल गया
नक़्ल-ए-दुनिया में मुब्तिला इंसान
मक़सद-ए-ज़िंदगी को भूल गया
— Simar Gozra















