सोचता हूँ तेरा क्या लगता हूँ
दर्द या फिर मैं दवा लगता हूँ
उस ने पूछा तो बता देता ना
रिश्ते में मैं तेरा क्या लगता हूँ
सारी दुनिया है परेशाँ मुझ से
क्या मैं तुझ को भी बुरा लगता हूँ
अब तो आँखें भी न ख़ुद से मिलती
मैं तो ख़ुद से भी ख़फ़ा लगता हूँ
क्यूँ दिखाते हो ये शीशा मुझ को
मुँह पे बोलो मैं बुरा लगता हूँ
मेरी ख़ल्वत भी ख़ला है जो अब
मैं तो ख़ुद से भी जुदा लगता हूँ
— Simar Gozra















