tere milne ka aakhiri imkaan | तेरे मिलने का आख़िरी इम्कान

  - Swapnil Tiwari

तेरे मिलने का आख़िरी इम्कान
जैसे मुझ में है एक नख़लिस्तान

घर में लगता नहीं है जी मेरा
दश्त में रह गया मिरा सामान

रेत में सीपियाँ मिली हैं मुझे
क्या समुंदर था पहले रेगिस्तान

लौटे शायद इसी बहाने वो
रख लिया मैं ने उस का कुछ सामान

तू तिरे इर्द-गिर्द ही है कहीं
हर तरफ़ ढूँढ हर जगह को छान

दूर तक कोई भी नहीं दिल में
आख़िरी शहर भी मिला वीरान

किस ने फूंकी है जिस्म में साँसें
किस ने छेड़ी है ज़िंदगी की तान

ख़ाक हो जाएगा बदन 'आतिश'
होंगे इक दिन धुआँ ये जिस्म ओ जान

  - Swapnil Tiwari

Ghar Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Swapnil Tiwari

As you were reading Shayari by Swapnil Tiwari

Similar Writers

our suggestion based on Swapnil Tiwari

Similar Moods

As you were reading Ghar Shayari Shayari