तुम्हारे शहर में मुझ ऐसे जंगली के लिएदरख़्त ही नहीं दिखते हैं ख़ुद-कुशी के लिएमैं रोज़ रात यही सोच कर तो सोता हूँके कल से वक़्त निकालूँगा ज़िन्दगी के लिएवो लम्हा आ ही गया इंतिज़ार का लम्हाघड़ी भी बंद है पहले से इस घड़ी के— Swapnil Tiwari