तुम्हारे शहर में मुझ ऐसे जंगली के लिए
दरख़्त ही नहीं दिखते हैं ख़ुद-कुशी के लिए
मैं रोज़ रात यही सोच कर तो सोता हूँ
के कल से वक़्त निकालूँगा ज़िन्दगी के लिए
वो लम्हा आ ही गया इंतिज़ार का लम्हा
घड़ी भी बंद है पहले से इस घड़ी के
— Swapnil Tiwari
दरख़्त ही नहीं दिखते हैं ख़ुद-कुशी के लिए
मैं रोज़ रात यही सोच कर तो सोता हूँ
के कल से वक़्त निकालूँगा ज़िन्दगी के लिए
वो लम्हा आ ही गया इंतिज़ार का लम्हा
घड़ी भी बंद है पहले से इस घड़ी के
Other ghazal from the same pen
Shers of neend.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling