उतरा उतरा तो यूँँ चेहरा न घड़ी का होता
ज़ाइक़ा वक़्त का थोड़ा भी जो मीठा होता
रात इक रोज़ तो मेले में निकलती अपने
चाँद इक शाम तो पानी का बताशा होता
तब मुझे सब ही समझते तिरा जोगी जानाँ
मेरे माथे पे अगर हिज्र का टीका होता
— Swapnil Tiwari
ज़ाइक़ा वक़्त का थोड़ा भी जो मीठा होता
रात इक रोज़ तो मेले में निकलती अपने
चाँद इक शाम तो पानी का बताशा होता
तब मुझे सब ही समझते तिरा जोगी जानाँ
मेरे माथे पे अगर हिज्र का टीका होता
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