शर्मिंदा हम जुनूँ से हैं एक एक तार के

क्या कीजिए कि दिन हैं अभी तक बहार के

ऐ उम्र-ए-शौक़ देखिए मिलता है क्या जवाब
हम ने किसी का नाम लिया है पुकार के

सर-गश्ता-ए-अलम हो कि शोरीदा-सर कोई
एहसाँ हैं अहल-ए-शौक़ पे दीवार-ए-यार के

अल्लाह रे इंतिज़ार-ए-बहाराँ की लज़्ज़तें
गुज़री है यूँ ख़िज़ाँ भी कि दिन हों बहार के

'ताबिश' सुकून-ए-दर्द से तस्कीन-ए-मर्ग तक
दिल हो अगर तो लाख हैं पहलू क़रार के

— Tabish Dehlvi

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