kya ghalatfahmi men rah jaane ka sadma kuchh nahin | क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं

  - Tehzeeb Hafi

क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं
वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं

'इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर
ये भी सच है 'इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं

जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो
ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं

शुक्र है कि उसने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है
मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं

  - Tehzeeb Hafi

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