ज़ात शामिल है मेरी तेरी ज़ात में
क्यूँ उलझते रहे इन रिवायात में
राहते-दिल को है नींद लाज़िम मगर
नींद आती किसे है भला रात में
एक मुद्दत से हूँ नब्ज़ था
में हुए
मिलने आओगे तुम अबकी बरसात में
बात करने को ढेरों पड़ी हैं मगर
बात होती नहीं है मुलाक़ात में
— Abhishek Baba















