लगा न इतना भी हम को चस्का है ज़िंदगी का

कि अब तक आया ख़याल भी हो न ख़ुद-कुशी का

हो तुम से ख़ुद से वतन से रब से या इन सभी से
है इश्क़ सब इश्क़ ही है मौज़ू शा'इरी का

वगरना यूँ चोट दिल-लगी में न खाई होती
पता न था हम को मतलब उस वक़्त दिल-लगी का

फ़िराक़ को दाइमी समझकर बना मैं ऐसा
पर आ गए तुम तो क्या करूँ अब मैं बेरुख़ी का

अब उस ने माना है मुझ को दुश्मन मेरी ख़ता क्या
सबक़ सिखाऊँगा प्यार से उस को दुश्मनी का

— Ananth Faani

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