hamne har zakham ko seene se laga rakha hai | हमने हर ज़ख़्म को सीने से लगा रक्खा है

  - Haider Khan

हमने हर ज़ख़्म को सीने से लगा रक्खा है
ज़ख़्म के साथ ही जीने में मज़ा रक्खा है

दिल में हलचल है मगर लब पे है ख़ामोशी सी
कितने दरिया को समुंदर ने छुपा रक्खा है

हार जाएगा जो दुनिया से तो लौटेगा वो
इसलिए हमने ये दर अपना खुला रक्खा है

जबसे दीदार हुआ ख़्वाब में तेरा मुझको
तबसे आँखों में वही ख़्वाब सजा रक्खा है
'इश्क़ में हार भी जाओ तो नहीं है ये मात
इस
में नुकसान में पोशीदा नफ़ा रक्खा है

बस तेरी आँख से आँसू के छलक जाने पर
चंद लोगों ने जहाँ सर पे उठा रक्खा है

जो मुयस्सर न हुआ मुझको ख़यालों तक में
बेवजह दिल ने उसे अपना बना रक्खा है

कोई अख़्लाक़ में तुझ सेा जो मिले तो समझूँ
नाम तुझ सेा है तो क्या? नाम में क्या रक्खा है

  - Haider Khan

Kashmir Shayari

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