कुछ भी कर ले वो मेरा ख़ास नहीं होता कभी

जिस्म तक आ के जो अन्फ़ास नहीं होता कभी

बद-दुआ' पहली मोहब्बत की लगी है मुझ को
जिस को भी चाहूँ मेरे पास नहीं होता कभी

एक दुख ये है कि मैं तुझ से ख़फ़ा रहता हूँ
उस पे फिर तुझ को ये एहसास नहीं होता कभी

मुंतज़िर हूँ कि इशारा हो तो रोज़ा खोलूँ
और वो है कि मेरी प्यास नहीं होता कभी

इक यही ख़ूबी बचा लेती है अक्सर मुझ को
टूट तो जाता हूँ बे-आस नहीं होता कभी

— Haider Khan

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Mazhab Shayari

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