vo purane din hamaare hamko lautaae koi | वो पुराने दिन हमारे हमको लौटाए कोई

  - Haider Khan

वो पुराने दिन हमारे हमको लौटाए कोई
काश अपने गुल्सिताँ को फिर से महकाए कोइ

ख़ून से लत-पथ है हर पन्ना यहाँ अख़बार का
ऐसे आलम में भला क्या दिल को बहलाए कोई

इस तरह दिल में ग़मों की गूँजती हैं आहटें
जिस तरह वीरान घर में लौट कर आए कोई

शहर में बसना-बसाना ठीक है यारों मगर
गाँव को कैसे तड़पता छोड़ कर जाए कोई

हदस ज़्यादा कोशिशों में टूट जाती है ये डोर
डोर रिश्तों की ये उलझी कैसे सुलझाए कोई

दहर में शादाब रखती है मोहब्बत ज़ीस्त को
हर जगह इस बीज को अब जा के बिखराए कोई

  - Haider Khan

Gaon Shayari

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