वो पुराने दिन हमारे हमको लौटाए कोई
काश अपने गुल्सिताँ को फिर से महकाए कोइ
ख़ून से लत-पथ है हर पन्ना यहाँ अख़बार का
ऐसे आलम में भला क्या दिल को बहलाए कोई
इस तरह दिल में ग़मों की गूँजती हैं आहटें
जिस तरह वीरान घर में लौट कर आए कोई
शहर में बसना-बसाना ठीक है यारों मगर
गाँव को कैसे तड़पता छोड़ कर जाए कोई
हदस ज़्यादा कोशिशों में टूट जाती है ये डोर
डोर रिश्तों की ये उलझी कैसे सुलझाए कोई
दहर में शादाब रखती है मोहब्बत ज़ीस्त को
हर जगह इस बीज को अब जा के बिखराए कोई
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