मैं सदा-परवर कहीं मिटने लगी हूँ शोर से
ज़िंदगी अब रोक ले बटने लगी हूँ शोर से
कैसे कह दूँ ख़ामुशी से और ऊँचा कर मुझे
मैं मोहब्बत की पतंग कटने लगी हूँ शोर से
पहले तो आवाज़ का आसेब खुलता ही न था
अब खुला है ये तो मैं लड़ने लगी हूँ शोर से
ख़ामुशी फिर से दुआ दे मेरी क़ामत के लिए
ख़ामुशी अब मान ले घुटने लगी हूँ शोर से
— Uzma Naqvi















