एक रात सोचते ही सोचते गुज़र गई
मेरे इश्क़ से वो नाज़नीं अमा मुकर गई
इक वो इश्क़ के सफ़र में मेरे साथ निकली थी
क्या हुआ ख़बर नहीं वो रस्ते में उतर गई
उस ने अपनी मर्ज़ी से निकाह कर लिया वहाँ
अब कहीं रहे वो जाँ मिरे लिए तो मर गई
मैं तो एक हादसे में ज़ख़्मी बस हुआ मगर
जान-ए-जाँ के पास मरने की मिरे ख़बर गई
तेरे जाने का मुझे नहीं है दुख मगर मुझे
एक तेरी याद मुझ को जान रुसवा कर गई
सबके दिल वो एक इक दफ़ा जो तोड़ा करती थी
मैं ने ये सुना है अब वो नाज़ुकी सुधर गई
— Vaseem 'Haidar'















