हर किसी को मिरा बस यही ज्ञान है
भूल जाओ उसे सबकी जो जान है
इक मिरे गाँव की यारो मस्जिद है जो
इक वो मस्जिद ज़माने से वीरान है
ग़ैर की महफ़िलों में जो ख़ुश है वहाँ
क्यूँ करूँ याद अपना भी ईमान है
याद उस को करेंगे नहीं कहते हैं
कहना भी यार कितना ये आसान है
अब नहीं है मुझे इल्म वो है कहाँ
क़ल्ब मेरा बहुत दिन से शमशान है
उस ने इतना रुलाया मुझे इश्क़ में
देखा जाए तो वो मेरा मेहमान है
— Vaseem 'Haidar'















