aansoon ko apni palkon par saja kar le gaya | आँसूओं को अपनी पलकों पर सजा कर ले गया

  - Vijendra Singh Parwaaz

आँसूओं को अपनी पलकों पर सजा कर ले गया
मैं भी उस महफ़िल में कुछ शमएँ जला कर ले गया

एक एक चेहरे से जो नज़रें बचा कर ले गया
वो भी किस अंदाज़ के जल्वे चुरा कर ले गया

जिस्म मेरा है मगर मैं जिस्म में हूँ ही नहीं
एक झोंका याद का ऐसा उड़ा कर ले गया

आइने के सामने इक आइना लगता हूँ मैं
जाने वाला मेरी सूरत तक चुरा कर ले गया

मेरे दिल में जज़्ब हो कर रह गया तेरा वजूद
तू जिसे हासिल वो परछाई उठा कर ले गया

कुछ न पूछो तुम मिरी तख़्ईल की 'पर्वाज़' को
भीड़ में भी भीड़ से दामन बचा कर ले गया

  - Vijendra Singh Parwaaz

Jashn Shayari

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