दिल-खंडर में खड़े हुए हैं हम बाज़गश्त अपनी सुन रहे हैं हममुद्दतें हो गईं हिसाब किएक्या पता कितने रह गए हैं हमजब हमें साज़गार है ही नहींजिस्म को पहने क्यूँ हुए हैं हमरफ़्ता रफ़्ता क़ुबूल होंगे उसेरौशनी के लिए नए हैं हमवहशतें लग गईं ठिकाने सबदश्त को रास आ गए हैं हमधुन तो आहिस्ता बज रही है 'राज़'रक़्स कुछ तेज़ कर रहे हैं हम— Vikas Sharma Raaz