ज़ब्त का है जो हुनर मैं ने दिया है तुम को
मेरी आँखों से निकलते हैं तुम्हारे आँसू
क्यूँ न अब हिज्र को मैं इब्तिदा-ए-वस्ल कहूँ
आँख से मैं ने क़बा जैसे उतारे आँसू
दूसरे इश्क़ की सूरत नहीं देखी जाती
धुँधले कर देते हैं आँखों के नज़ारे आँसू
— Vikram Sharma















