मैं राह-ए-जन्नत का अस्ल नक़्शा चुरा रहा था
सो उँगलियों को तेरे लबों पर फिरा रहा था
मैं इस लिए भी सर अपना हाँ में हिला रहा था
मुझे पता है तू सिर्फ़ बातें बना रहा था
बिछड़ के हम से हमारी ग़लती गिना रहा था
हमारा ग़म था हमीं को आँखें दिखा रहा था
वो ख़ुद को दुनिया का एक हिस्सा बना चुकी थी
मैं अपने हिस्से का प्यार जिस पर लुटा रहा था
तुम्हीं ने जाने को कह दिया है तुम्हीं कहोगे
उसे बुलाओ, वो शे'र अच्छे सुना रहा था
— Vikram Gaur Vairagi















