"ज़िंदगी''

ज़िंदगी एक लड़के का मन है
जिसे बस अकेले ही बीरां के गुबंद के पीछे बने लॉन में रक़्स करती हुई और बिखरती हुई नीम के पेड़ की पत्तियाँ देखनी हैं
ज़िंदगी एक बच्चे की ज़िद है जिसे कोई दुनिया नहीं सिर्फ़ फूलों पे बैठी हुई तितलियाँ देखनी हैं
ज़िंदगी एक जोगन के पैरों के पड़ने पे निकली हुई ताल से मात खाता हुआ एक मृदंग है
ज़िंदगी ज़िंदगी के नशे में ही डूबे हुए एक मुसव्विर की कूची से छिटका हुआ रंग है
ज़िंदगी अपने महबूब को अपनी बाँहों में बे-ख़ौफ़ सोते हुए देखना है
और उसे चूमने की ख़्वाहिश का दिल में न आना है
ज़िंदगी इक नदी के किनारे पे चुप-चाप बैठे हुए दिन बिताना है
ज़िंदगी ज़िंदा रहने का अच्छा बहाना है
ज़िंदगी मेरे कमरे के बाहर बनी बाल्कनी में बदलते हुए मौसमों का मज़ा ले रही बिल्लियाँ हैं
ज़िंदगी बार बार आईना देख कर ख़ुद पे मरती हुई अपनी तस्वीरें लेती हुई बावली लड़कियाँ हैं
ज़िंदगी अपनी मस्ती में डूबी हुई गुनगुनाती हुई लकड़ियाँ बीनने दूर जाती हुई एक पहाड़न के गालों पे बिखरी हुई धूप है
ग़ौर से देखने पर पता चलता है ज़िंदगी हर जगह हर दफ़ा अपना ख़ुद का ही बदला हुआ रूप है
ये किताबों का दुनिया का लोगों का कोई गणित उस के बिल्कुल भी पल्ले नहीं पड़ रहा
ज़िंदगी एक नाराज़ बच्चा है जो मार खाकर भी स्कूल बस में नहीं चढ़ रहा

ज़िंदगी मेरा दिल है जो हर इक नए ज़ख़्म पर मुझ से बिल्कुल नई शा'इरी चाहता है
ज़िंदगी शा'इरी से भी आगे का कुछ है जहाँ लिखने वाला लिखे इस से पहले कई रोज़ तक ख़ामुशी चाहता है
ज़िंदगी से मैं ज़्यादा मिला तो नहीं पर मुझे इतनी पहचान है
ज़िंदगी शाहजादी के झुमके नहीं उस की मुस्कान है
ज़िंदगी मेरे सीने में बरसों से फैला बयाबान है
ज़िंदगी अपनी सूरत में सब कुछ है लेकिन
इस पे अब भी यही एक इल्ज़ाम है
ज़िंदगी मौत का दूसरा नाम है
ख़ैर अब मैं चलूँ मुझ को तन्हाइयों से बहुत काम है

— Vikram Gaur Vairagi

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