नेकियों का सवाब है कितना
ये ज़माना ख़राब है कितना
इश्क़ करना ख़ता नहीं लेकिन
हिज्र का ये अज़ाब है कितना
पूछते हो सबब उदासी का
आँसुओं में जवाब है कितना
मंज़िलें भी फ़रेब लगती हैं
ख़्वाहिशों का सराब है कितना
ज़ुल्म सह कर उदास हैं जब से
वक़्त का ही इताब है कितना
उँगलियों पर गिने नहीं जाते
आँसुओं का हिसाब है कितना
— Wasif Quazi














