Khawaja Imtiaz Kavish

Khawaja Imtiaz Kavish

@Imtiazkavish11

Khawaja Imtiaz Kavish shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Khawaja Imtiaz Kavish's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
बज़्म बे-रब्त है सोज़-ए-आहंग से गीत उल्फ़त के गाने से क्या फ़ाएदा
बाग़ सदियों से बे-नूर है दिलरुबा तेरा यूँ गुल खिलाने से क्या फ़ाएदा

हम भी आए गए इस जहाँ में मगर कोई हम को न हम सा मिला है कभी
जिस में कोई भी दिल रखने वाला न हो उस जहाँ में समाने से क्या फ़ाएदा

जो मोहब्बत समझता हो करता भी हो वो है फिरता लिए अपने तिश्ना से लब
जो मोहब्बत न समझे मगर बेच दे उस को शर्बत पिलाने से क्या फ़ाएदा

तीरगी तीरगी है इधर से उधर शम्अ जलते ही आतिश-फ़िशाँ घर हुआ
दिल न रौशन हो जब इल्म के नूर से अपने घर को जलाने से क्या फ़ाएदा

मेरी उल्फ़त को ठुकरा के तू चल बसा मेरी चाहत समझ कर पशेमाँ हुआ
जो हक़ीक़त थी उस को तो समझा नहीं अब कहानी बनाने से क्या फ़ाएदा

ये ख़ुशी-ओ-मसर्रत का आलम मगर तू समझता है मेरा मुक़द्दर नहीं
तुझ को हासिल हुआ है न होगा कभी मेरा यूँ दिल दुखाने से क्या फ़ाएदा

नासेहो अपने घर में भी झाँका करो कितने हैं जो तरसते हैं उल्फ़त को वाँ
दिल जो सदियों से अब तक मिले ही नहीं हाथ यूँ ही मिलाने से क्या फ़ाएदा

हम तो समझे थे दुनिया है पीछे वहाँ इस लिए और आगे ही बढ़ते गए
ढूँढने वाले जाने कहाँ खो गए नक़्श-ए-पा यूँ बनाने से क्या फ़ाएदा

वो तुम्हारा हुआ है न होगा कभी 'काविश' आओ ज़रा देख लो तुम मगर
उस के दिल पर असर जब न कर पाए तुम शायरी के ख़ज़ाने से क्या फ़ाएदा
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Khawaja Imtiaz Kavish
दिलकश है मसाफ़त का मज़ा राह-ए-थकन में
इक ख़ुशबू-ए-जन्नत है मिरी ख़ाक-ए-वतन में

या फ़रहत-ए-फ़न की है कोई अच्छी अलामत
या दर्द-ए-तमन्ना है मिरे रंग-ए-सुख़न में

सुनने को मयस्सर नहीं याँ कोई भी नग़्मा
कहने को तो बुलबुल भी नहीं मेरे चमन में

ये दिल की मसर्रत है कि नज़रों का तक़ाज़ा
तारों की रविश आई है फूलों की फबन में

मैं क़तरा-ए-गौहर हूँ जो आँखों से है टपका
तू शबनमी रेशम है जो छलका है समन में

चल मक़्तल-ए-उल्फ़त के मुक़द्दर से बरी हों
चल पलते हैं हम मिल के रह-ए-दार-ओ-रसन में

तुम भरते हो दम अपनी सख़ावत में उछल कर
तुम को हो ख़बर क्या कि मज़ा क्या है घुटन में

इक बर्ग-ए-तमन्ना थी सो जल उट्ठी है 'काविश'
इक वादा-ए-दिल था सो नज़र आया शिकन में
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दुश्मन की दुश्मनी का सफ़र कर रहा हूँ मैं
इक उम्र आगही का सफ़र कर रहा हूँ मैं

फूलों को छोड़ कर हूँ मैं काँटों पे आ गया
यूँ दिल की बंदगी का सफ़र कर रहा हूँ मैं

निकला हूँ अपने दिल के परिंदे को ढूँढने
यानी कि ज़िंदगी का सफ़र कर रहा हूँ मैं

दरिया से रुख़ बदल के यूँ लब-सोख़्ता कहीं
जंगल में तिश्नगी का सफ़र कर रहा हूँ मैं

हर पल लहू की आँच पे काग़ज़ को घोलना
यूँ दश्त-ए-शायरी का सफ़र कर रहा हूँ मैं

ख़ुद जी रहा हूँ जाने मैं कितने ग़मों के साथ
बस इक तिरी ख़ुशी का सफ़र कर रहा हूँ मैं

इक दिल ने मेरे दिल को है लूटा जहान से
इक दिल की दिलबरी का सफ़र कर रहा हूँ मैं

दिन गर्मी-ए-जहान की ख़ातिर ख़फ़ा रहा
रातों को रौशनी का सफ़र कर रहा हूँ मैं
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Khawaja Imtiaz Kavish
बहला रहे हैं दिल को ग़म-ए-ज़िंदगी से हम
लेते रहे हैं कुछ तो मज़े ख़ुद-कुशी से हम

नग़्मे तिरे लिए ही लिखे रात दिन सभी
कब सूद पा सकेंगे तिरी बंदगी से हम

गर जो हमारे दिल को ये रौशन न कर सके
तो फिर उलझ पड़ेंगे इसी चाँदनी से हम

अव्वल मिले नहीं जो मिले भी तो रो पड़े
कुछ इस तरह ख़फ़ा हुए उस अजनबी से हम

बस इसलिए के दिल की तरह जल न जाए घर
डरते रहेंगे शम्ओं से भी रौशनी से हम

है इस जहाँ से हमको कोई ख़ौफ़ तो नहीं
मर जाएँगे बिचारे तिरी बे-रुख़ी से हम

तुमको ख़बर भी होने न पाएगी बे-ख़बर
रुख़्सत जहाँ से लेंगे मगर ख़ामुशी से हम

दिन जो भी ज़िंदगी के बचे थे वो सब के सब
लो कर गए तुम्हारे हवाले ख़ुशी से हम

गर जो ख़ुदा लुटा दे हमें ज़िंदगी तो फिर
'काविश' जहाँ में दिल न लगाएँ किसी से हम
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