Prasoon

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    है वही कश्ती पुरानी है वही दरिया मेरा
    जिस पे तू आने न पाया है वही रस्ता मेरा

    मैं मिरी मसरूफ़ियत से तंग आ जाता हूँ दोस्त
    मुझ को सीने से लगा के वक़्त कर ज़ाया मेरा

    अपनी वहशत का तक़ाज़ा ढूंढता हूँ दर-ब-दर
    ले गया है कोहकन जिस रोज़ से तेशा मेरा

    याद कर कूचा-नवर्दी,याद कर उल्फ़त के दिन
    याद कर बातें मेरी और याद कर चेहरा मेरा

    जब हवाएँ थक गईं थीं कोशिशें कर दश्त में
    रेत तब रक्साँ हुई थी चूम कर साया मेरा

    बारिशों को मौसमों का खेल सब कहते हैं पर
    रो पड़े थे अब्र-पारे जान कर क़िस्सा मेरा

    आँख वो हँसती रही तो खिल उठे सूखे गुलाब
    आँख वो रोने लगी तो रो पड़ा सहरा मेरा

    ख़ुसरवान-ए-शहर मैं हो जाऊँगा इक लम्स से
    और फ़क़त इक दीद से भर जाएगा कासा मेरा

    मैं किताबों के जहाँ का एक ख़ुशक़िस्मत किताब
    नाव बच्चों ने बनाया फाड़ कर सफ़्हा मेरा

    उस नज़र को ख़्वाहिशों का शौक़ दे मेरा ख़याल
    उस जबीं को रौशनी देता रहे बोसा मेरा

    मैं मुसलसल बंद करता हूँ मगर फिर दम-ब-दम
    याद उसकी खोलती जाती है दरवाज़ा मेरा
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    इस को क्या समझाना जानाँ
    दिल तो है दीवाना जानाँ

    जब ख़ुद को बिसराया मैं ने
    तब तुम को पहचाना जानाँ

    सारा जग ठुकराएगा जब
    तुम मुझ को अपनाना जानाँ

    तुम से हिजरत का मतलब है
    चेहरे का मुरझाना जानाँ

    दर्द-ओ-ग़म से भर जाना है
    ज़ख़्मों का भर जाना जानाँ
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    गर गली ख़ामोश और वीरान है
    सो हमारा तो वहीं इमकान है

    एक दिन हम भूल जाएंगे उसे
    वो हमारे ज़र्फ़ से अंजान है

    अब बिठा ले दिल में या पामाल कर
    अब फ़क़त तेरा दिल-ए-नादान है
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    झुका रहता है हरदम सर हमारा
    बुताँ तुम हो मदीने में हमारे
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    दो क़दम साथ गर चले होते
    सिलसिले और बन गए होते
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    चुराया है उसी ने दिल हमारा
    कभी शोख़ी कभी दिलकश अदा से
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    रक्स तक करना नहीं आता हमें
    किस तरह से क़ैस हों फरहाद हो
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    किसी बे-नाम रिश्ते को नया इक नाम देने से
    बिखर जाती हैं कुछ नज़्में फ़क़त उन्वान देने से
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    जीत का जज़्बा दिखाने के लिए
    लड़ रहा हूँ हार जाने के लिए

    बेसबब आँखों में मत आया करो
    तुम फ़क़त हो याद आने के लिए

    तोड़ वो दीवार हम तुम मिल गए
    जो रिवायत थी ज़माने के लिए

    बेसबब भी कुछ सबब तो चाहिए
    आब आंखों से बहाने के लिए

    इश्क़ दरिया में सफ़ीना क्यों मिले
    डूब जा तू पार पाने के लिए
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    जो गुज़रती उम्र के अहबाब हों
    नींद के साए में झुलसे ख़्वाब हों

    चाक की सूरत हरी हो दिल मिरे
    दर्द के सारे शजर शादाब हों

    हिज़्र की सारी क़िताबों को पढ़ें
    लोग जो याँ वस्ल को बेताब हों

    ये तक़ाज़े हैं जुनूँ के वास्ते
    सब गली सहरा नदी बे-आब हों

    फिर न होगी दीद की हसरत हमें
    गर कई चेहरे तिरे हम-ताब हों

    या उसी की आग में जलते रहें
    या उसी दो-चश्म में ग़र्क़ाब हों

    नाज़ करना उस नदी के हुस्न पर
    जिस नदी के सैकड़ों पायाब हों

    रक्स तक करना नहीं आता हमें
    किस तरह से दश्त में सैराब हों
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    Prasoon
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