Prasoon

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Prasoon shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Prasoon's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

है वही कश्ती पुरानी है वही दरिया मेरा जिस पे तू आने न पाया है वही रस्ता मेरा मैं मिरी मसरूफ़ियत से तंग आ जाता हूँ दोस्त मुझ को सीने से लगा के वक़्त कर ज़ाया' मेरा अपनी वहशत का तक़ाज़ा ढूंढता हूँ दर-ब-दर ले गया है कोहकन जिस रोज़ से तेशा मेरा याद कर कूचा-नवर्दी,याद कर उल्फ़त के दिन याद कर बातें मेरी और याद कर चेहरा मेरा जब हवाएँ थक गईं थीं कोशिशें कर दश्त में रेत तब रक्साँ हुई थी चूम कर साया मेरा बारिशों को मौसमों का खेल सब कहते हैं पर रो पड़े थे अब्र-पारे जान कर क़िस्सा मेरा आँख वो हँसती रही तो खिल उठे सूखे गुलाब आँख वो रोने लगी तो रो पड़ा सहरा मेरा ख़ुसरवान-ए-शहर मैं हो जाऊँगा इक लम्स से और फ़क़त इक दीद से भर जाएगा कासा मेरा मैं किताबों के जहाँ का एक ख़ुशक़िस्मत किताब नाव बच्चों ने बनाया फाड़ कर सफ़्हा मेरा उस नज़र को ख़्वाहिशों का शौक़ दे मेरा ख़याल उस जबीं को रौशनी देता रहे बोसा मेरा मैं मुसलसल बंद करता हूँ मगर फिर दम-ब-दम याद उस की खोलती जाती है दरवाज़ा मेरा — Prasoon
दो क़दम साथ गर चले होते सिलसिले और बन गए होते — Prasoon
हमारे बा'द सब आए यहाँ पर हमीं ने दश्त को वीरां किया था — Prasoon
रक़्स तक करना नहीं आता हमें किस तरह से क़ैस हों फ़रहाद हो — Prasoon
ता-दम-ए-मर्ग़ याद आएगी उस ने इस तरह बेवफाई की — Prasoon
झुका रहता है हरदम सर हमारा बुताँ तुम हो मदीने में हमारे — Prasoon
चुराया है उसी ने दिल हमारा कभी शोख़ी कभी दिलकश अदा से — Prasoon
भला कैसे वफ़ा के तौर हैं ये भला कैसी हमारी दोस्ती है — Prasoon
किसी बे-नाम रिश्ते को नया इक नाम देने से बिखर जाती हैं कुछ नज़्में फ़क़त उनवान देने से — Prasoon

Ghazal

बेख़ुद-ओ-बेक़रार हम भी थे दर-ब-दर अश्कबार हम भी थे उन दिनों दिल-फ़िग़ार हम भी थे एक धुन पर सवार हम भी थे हम उदासी में मुस्कुराते थे सो फ़रेब-ए-बहार हम भी थे ता-दम-ए-मर्ग ख़ाक-आलूदा रेत थे या ग़ुबार हम भी थे हम पे गो इख़्तियार था सबका लेक बे-इख़्तियार हम भी थे हम से ऊबा किया जहाँ सारा सा'अत-ए-इंतज़ार हम भी थे दश्त-दर-दश्त नाम था अपना रक़्स में ता-ग़ुबार हम भी थे जिस जगह इश्क़ ने किया वहशत ऐ दिल-ए-दाग़दार हम भी थे हम ने अब्र-ए-रवाँ को रोका था सर-ब-सर रेग़-ज़ार हम भी थे तू ने हम को कभी नहीं देखा पर सर-ए-रहगुज़ार हम भी थे सुब्ह ने भेद सारे खोल दिए सुब्ह तक बा-वक़ार हम भी थे — Prasoon
किसी की आँख के तारे, किसी के माह-पारे थे किसी की ना-मुकम्मल सी ग़ज़ल के इस्तियारे थे हवा ने नाम किस का रेत पर अब के उकेरा है बगूलों की ज़बाँ पे कल तलक क़िस्से हमारे थे घटा के होंठ पर आई मिरी आहों की गर्जन थी छतों की आँख से गिरते मिरी अश्कों के धारे थे फ़ज़ा ने हस्र बरपाया,ख़िज़ाँ ने अश्क़-बारी की फ़लक़ के जिस्म को छूते ज़मीनों के ग़ुबारे थे भटकते दर-ब-दर याँ-वाँ हुए थे ख़ाक-आलूदा बहाल-ए-सग तिरे कूचे में हम ने दिन गुज़ारे थे सर-ए-सहरा गिरे थक कर तो बस्ती का ख़याल आया बड़ी तुर्फ़ा जगह थी वो बड़े तुर्फ़ा नज़ारे थे हमारे दिल के इक कोने में थी शादाबियाँ,वाँ पर फ़क़त हस्ती तुम्हारी थी,फ़क़त जल्वे तुम्हारे थे नज़र के सामने चेहरा तुम्हारा था,लगा जैसे जहाँ सूखी हुई धरती वहीं पर अब्र-पारे थे समुंदर की निगाहों में फ़क़त वुस'अत थी दुनिया की नदी के ख़्वाब में आते समुंदर के किनारे थे — Prasoon