निगाह-ए-यार कैसी है, लब-ओ-रुख़सार कैसे हैं

ग़ज़ल के जाविये से देख, ये अश'आर कैसे हैं

कभी छलनी किया सीना कभी मरहम बने आए
रुला कर के मनाते हैं, मिरे सरकार कैसे हैं

खिला रहता है ये चेहरा बरसती हैं मगर आँखें
छुपाए छुप नहीं पाते तिरे असरार कैसे हैं

हमें अहवाल अब उन का हवाएँ ही बताएंगी
कभी इस पार थे जो लोग वो उस पार कैसे हैं

अना को भूल जाते हैं, तिरी सोहबत मिले ज्यूँ ही
ख़मों के पेंच में उलझे सभी दस्तार कैसे हैं

कभी अपने हक़ीक़त की बयानी कर नहीं पाते
नज़र लेकिन मिलाते हैं, करिश्मा-कार कैसे हैं

— Prasoon

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Raaz Shayari

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