है यही अपना नसीबाँ क्या करूँँ
हो गई दुनिया हरीफ़ाँ क्या करूँ
तू ने ही सब ग़म दिए ये इल्म है
तो तुझे मैं ग़मगुसाराँ क्या करूँ
ढूँढ़ता तुझ को है नादाँ याँ से वाँ
है यही हाल-ए-परीशाँ क्या करूँ
दश्त में या रेत पे रक्साँ है पर
दिल न पावे है कराराँ क्या करूँ
हर तरफ़ मेरी अना का ज़िक्र है
सो अना से मैं गुरेज़ाँ क्या करूँ
जिन ने राह-ए-इश्क़ पर लाया मुझे
कर रहे हैं संग-बाराँ क्या करूँ
— Prasoon















