उस से मिलने की है चाहत
जिस की करते हैं इबादत
जिस की करते हैं इबादत
जब भी की उस से शिकायत
जैसे ख़ुदस की है नफ़रत
क्या कहूँ मैं है इजाज़त
हाँ! है तुम से ही मोहब्बत
जी की इतनी ही है हसरत
तू उठाए अपना घूँघट
है बड़ा ये राज़ ख़ुद में
हम जिसे कहते हैं क़ुदरत
तुम न रोना यूँ कभी अब
है तुम्हीं से मेरी ताक़त
देखता ही रह गया मैं
जबसे देखी तेरी सूरत
और कुछ आदत नहीं है
बस तुम्हीं हो मेरी आदत
वो ख़फ़ा हो कर न बोले
तो बरसती है क़यामत
जब तलक तू पास में हो
दूर हों तब सारी दिक़्क़त
माँगते हैं ये दुआ बस
वो हमेशा हों सलामत
ख़्वाब में वो अब मिलेंगे
ख़्वाब अपनी है ज़रूरत
वो नहीं ये जानते हैं
दिल पे उन की है हुकूमत
सब हक़ीक़त झूठ ही है
वो ही केवल है हक़ीक़त
बात मेरी वो समझ ले
तो मुझे होती है हैरत
हाल मेरा तब ही पूछा
जब कभी हो उस को फ़ुर्सत
दर्द दे कर ही सिखाया
जब ख़ुदा ने की इनायत
जो मिली तोयेश को है
तू वही है एक दौलत
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उसी मोड़ पर फिर से आ कर खड़ा हूँ
जहाँ प्यार में भी ख़ुदी मैं अड़ा हूँ
जहाँ प्यार में भी ख़ुदी मैं अड़ा हूँ
मुझे रूठना है उसी की तरह तो
मगर ये न कहना के मैं अब बड़ा हूँ
छलकता हूँ ग़ज़लें तो लगता है जैसे
भरा सा किसी का कोई मैं घड़ा हूँ
मुझे देख दुनिया में आ कर गिरा हूँ
ख़ुदा के मैं दामन से जैसे झड़ा हूँ
समय का बड़ा खेल है तुम भी देखो
जहाँ था कभी मैं वहीं अब खड़ा हूँ
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बात दिल की कभी नहीं कहता
जान को जान ही नहीं कहता
जान को जान ही नहीं कहता
वो नहीं देखते हमें लेकिन
पर ख़ुदा से कभी नहीं कहता
ये मोहब्बत मुझे रुलाती है
हम सफ़र को सही नहीं कहता
मर गया प्यार में मगर देखो
प्यार ने जान ली नहीं कहता
दिल गया हाथ से मगर उस को
मैं गुनहगार ही नहीं कहता
जिस में भी हुस्न की हवस हो मैं
तो उसे आशिक़ी नहीं कहता
जिस ख़ुशी में शरीक तुम ही न हो
मैं उसे कुछ ख़ुशी नहीं कहता
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