संसार को बेहद ज़ालिम जान लिया मैंने
फिर उससे मिला हाथों को चूम दिया मैंने
जो उसने किताब-ए-ग़म तोहफ़े में मुझे दी थी
इक पन्ना ये याद-ए-रफ़्ता चूम लिया मैंने
यूँ तो लिख लूँगा अपने आप ही मेरी कहानी मैं
हो इन में नाम गर अपनों के भी शामिल तो क्या होता
बुरे हालात है तो क्या हुआ इंसान अच्छा हूँ
सभी रहते यहाँ मुझसे खफ़ा इंसान अच्छा हूँ
ये मेरी जेब में जब तक अमीरी की निशानी थी
मुझे सारा ज़माना कहता था , इंसान अच्छा हूँ
मैं तेरी बे-वफ़ाई के सभी क़िस्सों से वाक़िफ़ हूँ
मैंने फिर भी रखी तुमसे वफ़ा ,इंसान अच्छा हूँ
ये तुम रोज किस दरिया में बह रहे हो
ये दिल खाली है, तुम कहाँ रह रहे हो
ये मैं हूँ कि ग़म में लिखे जा रहा हूँ
वो कहते हैं अच्छी ग़ज़ल कह रहे हो
ये कहानी झूठी है ,पर सच्चा मैं किरदार हूँ
यूँ ख़फ़ा मत हो तू ,मैं तेरे बिना बे-कार हूँ
ए मोहब्बत के समुंदर मुझ को ले डूबेगा तू
कश्ती भी उसकी हुई ,ऊपर से बे-पतवार हूँ
"चाय"
तेरे मेरे मिलन की बात कुछ ऐसी है
थकान और चाय के कप जैसी है
जब भी जिंदगी से थक हार जाऊँ मैं
अपनी बाहों में जगह देना मुझको
और जब जाने की जिद करुँ तो
एक कप चाय और बना देना मुझको
ये सोचा था ग़रीबी को किताबों से मिटाऊँगा
न था मालूम मैं भूखा किताबें ही खा जाऊँगा
मिरे कंधों पे घर का बोझ आता जा रहा है अब
मैं अब ख़्वाबों को बाहर का ही रास्ता तो दिखाऊंँगा