Ahmad Faqih

Ahmad Faqih

@ahmad-faqih

Ahmad Faqih shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Faqih's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
वक़्त के हर इक नक़्श का मअ'नी इतना बदला बदला होगा
मेरे वहम-ओ-गुमान में कब था इश्क़ का मंज़र ऐसा होगा

आज मुझे अपनी आँखों से उस के क़ुर्ब की ख़ुशबू आई
मेरी नज़र से उस ने शायद अपने-आप को देखा होगा

लम्स के इस कोरे तालाब में चाँद का पहला अक्स तुम्ही हो
कैसे नूर-जहानी सुर में किस किस से वो कहता होगा

सुब्ह सुनहरी क्यूँ है इतनी शाम में इतनी लाली क्यूँ है
वक़्त ने शायद तेरी आँख की शबनम से मुँह धोया होगा

आज मैं आईने में अपनी सूरत तक पहचान न पाया
सोच रहा हूँ मुझ से ज़ियादा कौन इस शहर में तन्हा होगा

छोड़ 'फ़क़ीह' ये होनी का सुर अनहोनी की तान लगाओ
होनी में है कोई हुनर क्या होनी को तो होना होगा
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Ahmad Faqih
मैं क्या हूँ मुझे तुम ने जो आज़ार पे खींचा
दुनिया ने मसीहाओं को भी दार पे खींचा

ज़िंदों का तो मस्कन भी यहाँ क़ब्र-नुमा है
मुर्दों को मगर दर्जा-ए-अवतार पे खींचा

वो जाता रहा और मैं कुछ बोल न पाया
चिड़ियों ने मगर शोर सा दीवार पे खींचा

कुछ भी न बचा शहर में जुज़ रोने की रुत के
हर शोला-ए-आवाज़ को मल्हार पे खींचा

यूसुफ़ कभी नीलाम हुआ करता था लेकिन
यूसुफ़ को भी इस शहर ने है दार पे खींचा

फूटे हैं मेरे दिल में फिर इंकार के सोते
फिर दिल ने मुझे हालत-ए-दुश्वार पे खींचा

हर शय की हक़ीक़त में उतर जाएँ अब आँखें
ज़ुल्मत ने मुझे दीदा-ए-बेदार पे खींचा

दुख आलम-ए-इंसान के थे जो वो छुपाए
ख़त चाँद को सर करने का अख़बार पे खींचा

तुम ने तो 'फ़क़ीह' अपनी अना कस के मुझे भी
पैकाँ की तरह हालत-ए-पैकार पे खींचा
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Ahmad Faqih
ख़ुद ही संग-ओ-ख़िश्त ख़ुद ही सर-जुनून-ए-सर हूँ मैं
ख़ुद ही मैं नख़चीर दाना ख़ुद ही बाल-ओ-पर हूँ मैं

मुंतज़िर हूँ एक क़तरे का जो दे इज़्न-ए-सफ़र
जो तह-ए-सहरा है महव-ए-ख़्वाब वो सागर हूँ मैं

चाँद को आबाद कर लेकिन मेरी फ़िक्र-ओ-नज़र
देख मुद्दत से है जो वीराँ पड़ा वो घर हूँ मैं

इतना सादा-दिल कि दर्द-ए-दिल के हक़ में जान दूँ
पर दर-ए-का'बा न जाऊँ इस क़दर ख़ुद-सर हूँ मैं

इस क़दर वहशी कि ख़ुद पी जाऊँ अपना ख़ून-ए-दिल
इतना शाइस्ता कि शहर-ए-इश्क़ का दिलबर हूँ मैं

तिश्ना-लब पर कुछ अदब वाजिब नहीं दरियाओं का
ये सबब है जो रिवायत से खड़ा बाहर हूँ मैं

चियूँटियों के रेंगने की भी सदा आए जहाँ
इतने चुप सहमे नगर में ज़र्ब आहन-गर हूँ मैं

इस क़दर तन्हा कि डर जाता हूँ अपनी साँस से
इतना पेचीदा कि अपनी ज़ात में लश्कर हूँ मैं

साँस आती भी नहीं और जाँ से जाती भी नहीं
हिज्र बाहर था तो हिजरत दर्द के अंदर हूँ मैं

चंद घड़ियाँ और है ये हब्स का मौसम 'फ़क़ीह'
रुख़ हवा का देख सकता है जो दीदा-वर हूँ मैं
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Ahmad Faqih