Ahmad Hamdani

Top 10 of Ahmad Hamdani

    याद क्या क्या लोग दश्त-ए-बे-कराँ में आए थे
    रंग लेकिन कब ये चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ में आए थे

    किस तमन्ना से तुम्हें देखा था किस चाहत से हम
    रक़्स करते हल्क़ा-ए-वारफ़्तगाँ में आए थे

    सूरतें क्या क्या दिल-ए-आईना-गर में बस गईं
    हम से बे-सूरत भी तो बज़्म-ए-जहाँ में आए थे

    सादगी से हम ने समझा था हमारा ज़िक्र है
    तज़्किरे कुछ और ही उन के बयाँ में आए थे

    हर नई मुश्किल पे हम सोचा किए हैं देर तक
    लोग पहले भी तो कुछ शहर-ए-बुताँ में आए थे

    ये गुल-ए-तर की सी ख़ुश्बू किस तरफ़ से आ गई
    हम बगूले थे भला कब गुलिस्ताँ में आए थे

    क्यूँ हमारे साँस भी होते हैं लोगों पर गिराँ
    हम भी तो इक उम्र ले कर इस जहाँ में आए थे
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    Ahmad Hamdani
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    मुज़्तरिब हैं वक़्त के ज़र्रात सूरज से कहो
    आ गई क्यूँ आग की बरसात सूरज से कहो

    हम हैं और शो'लों की लपटें बढ़ रही हैं हर तरफ़
    क्या हुई वो छाँव की इक बात सूरज से कहो

    नाचते हैं ये भयानक साए आख़िर किस लिए
    ज़ेर-ए-लब क्या कह रही है रात सूरज से कहो

    एक तपता दश्त है और साथ कोई भी नहीं
    किस सफ़र में है अकेली ज़ात सूरज से कहो

    रेंगते हैं नाग अंदेशों के साँसों में यहाँ
    ढलने में आती नहीं है रात सूरज से कहो

    ज़ो'म होने का रहा इक उम्र हम को और आज
    जल गए सब धूप में जज़्बात सूरज से कहो
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    Ahmad Hamdani
    9
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    नहीं मिलते वो अब तो क्या बात है
    यहाँ ख़ुद से भी कब मुलाक़ात हे

    तिरे ध्यान के सब उजाले गए
    बस अब हम हैं और दुख भरी रात है

    हमारी तरफ़ भी कभी इक निगाह
    हमें भी बहुत नश्शा-ए-ज़ात है

    सुलगता हुआ दिन जो कट भी गया
    तो फिर आँच देती हुई रात है

    शिकायत किसी से तो किया थी मगर
    गिला एक रस्म-ए-ख़राबात है

    नया दुख तो मिलता है किस को यहाँ
    मगर ग़म की हर शब नई रात है

    हर इक शाम ताज़ा उमीद-ए-विसाल
    हर इक रोज़ रोज़-ए-मुकाफ़ात है
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    Ahmad Hamdani
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    ये तेरी चाह भी क्या तेरी आरज़ू भी क्या
    हमारे जिस्म में ये दौड़ता लहू भी क्या

    है जिस के ध्यान में हर लम्हा ख़्वाब का आलम
    मिले कहीं तो करें उस से गुफ़्तुगू भी क्या

    तिरे ख़याल की ख़ुश्बू तिरे जमाल का रंग
    हमारे दश्त में लेकिन ये रंग-ओ-बू भी क्या

    ये तपती रेत ये प्यासी ज़मीं यहाँ लोगों
    किसी के प्यार से महकी हुई नुमू भी क्या

    हज़ार कोह-ओ-बयाबाँ किए हैं तय लेकिन
    हुए हम आबला-पायाँ लहू लहू भी क्या

    किसी की याद में कट जाए ज़िंदगी सारी
    इक आरज़ू तो है लेकिन ये आरज़ू भी क्या
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    Ahmad Hamdani
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    दिल तुझे पा के भी तन्हा होता
    दूर तक हिज्र का साया होता

    और तो अपने लिए क्या होता
    अपना दुख ही कोई अपना होता

    आप आते कि न आते दिल में
    जलता-बुझता कोई शो'ला होता

    आरज़ू फिर नई करते ता'बीर
    फिर नया कोई तमाशा होता

    फिर वही एक ख़लिश सी होती
    फिर किसी ने हमें देखा होता

    ज़ख़्म फिर कोई महकता दिल में
    सामने फिर कोई चेहरा होता

    फिर गले वहशतें मिलतीं हम से
    फिर वही हम वही सहरा होता

    थे ख़फ़ा तुम तो हमारा दम-साज़
    आफ़त-ए-जाँ कोई तुम सा होता

    तुझ को नफ़रत है तो अपना दिल भी
    रफ़्ता रफ़्ता तुझे भूला होता

    थक के सोया है जो अब रात गए
    शाम होते उसे देखा होता
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    Ahmad Hamdani
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    मुँह अँधेरे घर से निकले फिर थे हंगा
    में बहुत
    दिन ढला तन्हा हुए और रात भर पिघले बहुत

    रंज के अंधे कुएँ में रात अब कैसे कटे
    देखने को दिन में देखे चाँद से चेहरे बहुत

    फिर भी हम इक दूसरे से बद-गुमाँ क्या क्या रहे
    झूट हम ने भी न बोला तुम भी थे सच्चे बहुत

    था इरादा उन के घर से बच के हम निकलें मगर
    हर क़दम पर उन के घर के रास्ते आए बहुत

    इन दिनों रहते हैं लोगों से हमें क्या क्या गिले
    और लगते भी हैं हम को लोग सब अच्छे बहुत

    पेड़ अपने दश्त में अब हम लगा कर क्या करें
    धूप ने फैला दिए हैं दूर तक साए बहुत
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    Ahmad Hamdani
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    लम्हा लम्हा कह रही हैं कुछ फ़ज़ाएँ आग की
    ज़र्रा ज़र्रा आ रही हैं क्या सदाएँ आग की

    ख़ुश्क पेड़ों के लबों पर क्या दुआएँ हैं सुनो
    छा रही हैं हर तरफ़ देखो घटाएँ आग की

    कूचा-ओ-बाज़ार भी दीवार-ओ-दर भी आग हैं
    इक इशारा सा है फ़सलें लहलहाएँ आग की

    आग की लहरें हैं या लोगों की साँसें हैं यहाँ
    देखना ये बस्तियाँ अब बन न जाएँ आग की

    जिस्म तो कब का जला अब रूह तक जाती है आँच
    चल रही हैं तेज़ कैसी ये हवाएँ आग की

    उड़ रहा है इक बगूला आग बरसाता हुआ
    खेतियाँ सब नज़्र लोगों हो न जाएँ आग की
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    Ahmad Hamdani
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    चाँद ओझल हो गया हर इक सितारा बुझ गया
    आँधियाँ ऐसी चलीं फिर दिल हमारा बुझ गया

    अब तो हम हैं और समुंदर और हवाएँ और रात
    दूर से करता था झिलमिल इक किनारा बुझ गया

    घूरते हैं लोग बैठे क्या ख़लाओं में कि अब
    हर इशारा बुझ गया है हर सहारा बुझ गया

    हर नज़र के सामने अब बे-कराँ पहली सी रीत
    जगमगाता बात करता दश्त सारा बुझ गया

    जम गई है बर्फ़ कैसी हर तरफ़ लोगों यहाँ
    राख तक ठंडी पड़ी क्या क्या शरारा बुझ गया

    शहर चुप हैं रास्ते ख़ामोश हैं चेहरे उदास
    बस बगूले उड़ रहे हैं हर नज़ारा बुझ गया
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    Ahmad Hamdani
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    गर्द कैसी है ये धुआँ सा क्या
    जा रहा है वो कारवाँ सा क्या

    हो गया कोई मेहरबाँ सा क्या
    रंज का बंध गया समाँ सा क्या

    तक रहे हैं ख़ला में हम किस को
    बन रहा है वो इक निशाँ सा क्या

    सिलसिला कुछ उदासियों का भी
    जगमगाता है कहकशाँ सा क्या

    हम भी अच्छे हैं दर्द भी कम है
    दिल से उट्ठा मगर धुआँ सा क्या

    कैसे टूटे सुकूत-ए-शाम-ए-फ़िराक़
    हर तरफ़ शोर-ए-बे-अमाँ सा क्या

    ये मोहब्बत है या है कोई तिलिस्म
    पीछा करता है इक गुमाँ सा क्या
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    Ahmad Hamdani
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    अब ये होगा शायद अपनी आग में ख़ुद जल जाएँगे
    तुम से दूर बहुत रह कर भी क्या पाया क्या पाएँगे

    दुख भी सच्चे सुख भी सच्चे फिर भी तेरी चाहत में
    हम ने कितने धोके खाए कितने धोके खाएँगे

    कल के दुख भी कौन से बाक़ी आज के दुख भी कै दिन के
    जैसे दिन पहले काटे थे ये दिन भी कट जाएँगे

    अक़्ल पे हम को नाज़ बहुत था लेकिन ये कब सोचा था इश्क़ के हाथों ये भी होगा लोग हमें समझाएँगे

    आँखों से ओझल होना क्या दिल से ओझल होना है
    तुझ से छुट कर भी अहल-ए-ग़म क्या तुझ से छुट जाएँगे

    हम से आबला-पा जब तन्हा घबराएँगे सहरा में
    रास्ते सब तेरे ही घर की जानिब को मुड़ जाएँगे
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    Ahmad Hamdani
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