Deepak Vikal

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    मंज़र पानी पानी है
    आँखों में वीरानी है

    वो जो है इक बर्फ़ नदी
    भीतर बहता पानी है

    मैं भी ज़िंदा रहता पर
    दुनिया भी तो फ़ानी है

    सूरज पे काला धब्बा
    उसकी कारस्तानी है

    अब तो ख़्वाबों की दुनिया
    बिल्कुल ही अनजानी है

    हम आदम के बच्चे थे
    लेकिन बात पुरानी है

    नाम रहेगा राजा का
    जंग में आगे रानी है

    ख़त्म कहानी कैसे हुई
    ये भी एक कहानी है
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    Deepak Vikal
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    इक नई गुड़िया को लेकर खिलखिलाना था मगर
    सिर्फ़ बच्ची मुस्कुराई मुस्कुराकर रुक गई
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    तभी गर्दिश में है तारा हमारा
    किसी ने दिल नहीं तोड़ा हमारा

    न होती नौकरी तो सोचता हूँ
    वो तब भी देखती रस्ता हमारा

    गुलाबी धूप छत पर आ गई है
    निकल आएगा अब चंदा हमारा

    वो सावन और था दिन और थे तब
    तिरी बाँहों में था झूला हमारा

    लगा दी आग रिश्तों में हमीं ने
    हमीं को खा गया ग़ुस्सा हमारा

    किसी की बद्दुआओं का असर है
    समुंदर पी गया सहरा हमारा

    नहीं सदियों रुके आँसू हमारे
    हमीं पर जब खुला क़िस्सा हमारा
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    Deepak Vikal
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    कुछ घड़ी दिलकश लगा था मौत का चेहरा मुझे
    और फिर चिल्ला पड़ा मैं ज़िंदगानी के लिए
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    मुझसे अगर ये चाहते हो आदमी रहूँ
    बाज़ार जा रहा हूँ मुझे रोक लीजिये
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    मेरे नादाँ दिल उदासी कोई अच्छी शय नहीं
    देख सूखे फूल पर आती नहीं हैं तितलियाँ
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     क्या पता था इस तरह तुझसे जुदा हो जाएँगे
    ढूँढ़ने में तुझको ख़ुद ही लापता हो जाएँगे

    रौशनी की चाह में भटकेंगे पहले दर-ब-दर
    और फिर हम ख़ुद-ब-ख़ुद जलता दिया हो जाएँगे

    इसलिए भी बात अपने दिल की मैं कहता नहीं
    जानता हूँ लोग सब मुझसे ख़फ़ा हो जाएँगे

    लोग अक्सर पूछते हैं मुझसे तेरी रहगुज़र
    ऐसे तो हम एक दिन तेरा पता हो जाएँगे

    साथ तेरे जाएगी आँखों से ये बीनाई भी
    और आख़िर को सभी मंज़र फ़ना हो जाएँगे

    रास्ता पूछेगा कोई कुछ न बोलेंगे 'विकल'
    हाँ मगर हम ख़ुद उसी का रास्ता हो जाएँगे
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    कुछ बाहर कुछ भीतर भीतर रोते हैं
    इश्क़ में पड़ने वाले अक्सर रोते हैं

    मेघ गरजते हैं और बारिश होती है
    धरती पर जब मस्त-कलंदर रोते हैं

    तेरे हिज्र में हँसते भी हैं गाते भी
    कैसी वहशत है जो मिलकर रोते हैं

    हमको तो कुछ मछुआरे बतलाते हैं
    झीलें, दरिया और समंदर रोते हैं

    कुछ लोगों पर होती है रब की नेमत
    कि़स्मत वाले हैं जो खुलकर रोते हैं

    रोना फ़न है जबसे ये मालूम पड़ा
    रोने वाले हमसे बेहतर रोते हैं
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    Deepak Vikal
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    कौन था जिसके उन तक इशारे गए
    बज़्म से यूँ जो उठकर सितारे गए

    जाते जाते गईं सारी फ़नकारियाँ
    देखते देखते सब नज़ारे गए

    जागते जागते अपनी रातें कटीं
    सोते सोते कई दिन गुज़ारे गए

    उनकी ख़ातिर हैं हम महज़ इक पैरहन
    सुब्ह धारे गये शब उतारे गए

    पहले जी भर के रौंदे गये तब कहीं
    चाक पर रख के इक दिन सँवारे गए

    हाय! प्यासों पे गुज़रेगी कैसी ख़ुदा
    वो तो प्यासी नदी के किनारे गए

    कोई आवाज़ देता है उस पार से
    गर गए तो समझना कि मारे गए

    क्यूँ मुड़े हुस्ने-जानाँ की जानिब 'विकल'
    इक हमीं तो नहीं जो पुकारे गए
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    हम अपनी ज़ीस्त से बेज़ार होकर
    चले हैं काम पर तैयार होकर

    बहुत दिन बाद चारागर हमारा
    मिला हमको बहुत बीमार होकर

    समंदर में उभर आए किनारे
    सफ़र जब भी किया मयख़्वार होकर

    हमारी परवरिश भी इक सबब है
    जो तुमको चुभ रहे हैं ख़ार होकर

    न ले जाए चुराकर ख़्वाब कोई
    कि सोना है मुझे बेदार होकर

    मिरी तक़दीर का रौशन सितारा
    पड़ा होगा कहीं बीमार होकर
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    Deepak Vikal
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