Jalee Amrohvi

Jalee Amrohvi

@jalee-amrohvi

Jalee Amrohvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jalee Amrohvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
दस्त-ए-नाज़ुक से जो पर्दे को सँवारा तुम ने
मैं ये समझा कि नवाज़िश से पुकारा तुम ने

क्या हक़ीक़त में ग़म-ए-इश्क़ से मानूस हुए
या यूँ ही पूछ लिया हाल हमारा तुम ने

मेरे मक्तूब-ए-मोहब्बत मुझे वापस दे कर
कर ली तो है ये मोहब्बत भी गवारा तुम ने

निस्बतन आज हिजाबों में इज़ाफ़ा कैसा
ग़ालिबन जान लिया दिल का इशारा तुम ने

दौर-ए-माज़ी के हसीं गीत सुना कर अक्सर
और भी दर्द-ए-मोहब्बत को निखारा तुम ने

रफ़्ता रफ़्ता न भड़क जाए वो शो'ला बन कर
रख दिया है जो मिरे दिल में शरारा तुम ने

हैफ़-सद-हैफ़ कि दुनिया-ए-तरब में खो कर
कर लिया दर्द के मारों से किनारा तुम ने

अश्क कहते हैं कि पढ़ पढ़ के 'जली' की ग़ज़लें
दिल में महसूस किया दर्द का धारा तुम ने
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Jalee Amrohvi
बस्ती बस्ती कूचा कूचा शहर को लाला-फ़ाम किया
देखो तो इन अहल-ए-हवस ने कैसा क़त्ल-ए-आम किया

हम तो जहाँ के सुलतानों से बेहतर उस को जाने हैं
जिस ने रूखी सूखी खा कर गुदड़ी में आराम किया

हिर्स-ओ-हवा के इस जंगल में सिर्फ़ वही है मर्द-ए-जरी
नफ़्स का ताइर जिस इंसाँ ने ज़ीस्त में ज़ेर-ए-दाम किया

क़र्या क़र्या ख़ाक उड़ा कर शाम-ओ-सहर दरवेशों ने
कैसे कैसे संग-दिलों को हुस्न-ए-अमल से राम किया

ज़ुल्म की कालक ख़ून से धो कर हक़ की ख़ातिर वलियों ने
लोग हमेशा याद रखेंगे ऐसा ऊँचा काम किया

देख के नैरंगी-ए-गुलशन ठंडे दिल से सोचो तो
किस ने फ़रोग़-ए-ज़ुल्मत दे कर नूर-ए-सहर को शाम किया

जब भी रोया सिद्क़-ए-दिल से रब की हुब में ज़ार-ओ-ज़ार
अश्क-ए-'जली' ने मेरे हक़ में रहमत बन कर काम किया
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Jalee Amrohvi
वहशतों में इश्क़ की वो शाना फ़रमाएँगे क्या
ज़िंदगी उलझी हुई है बाल सुलझाएँगे क्या

ख़ुद ही तुम सोचो जो दुनिया में असीर-ए-ज़ात हैं
वो दुखों की भीड़ में आराम पहुँचाएँगे क्या

दौर-ए-इस्तिब्दाद में ऐ दिल फ़ुग़ाँ बे-सूद है
गर्मी-ए-फ़रियाद से पत्थर पिघल जाएँगे क्या

सोने चाँदनी की ये नहरें ये फ़लक-पैमा महल
बाद मरने के तिरे महशर में काम आएँगे क्या

हम ने सदियों का चमन छोड़ा वफ़ा की आस पर
अब तुम्हारे देस में भी ठोकरें खाएँगे क्या

ताक़त-ए-ज़ब्त-ओ-तहम्मुल कब की रुख़्सत हो चुकी
ना-तवान-ए-इश्क़ को वो और तड़पाएँगे क्या

ऐ शुआ'-ए-मेहर-ए-ताबाँ जल्वा-रेज़ी से तिरी
संग-रेज़े राह के अल्मास बन जाएँगे क्या

जो मुसलसल अस्र-ए-नौ से बरसर-ए-पैकार हैं
वो भी थक कर वक़्त के साँचे में ढल जाएँगे क्या
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Jalee Amrohvi
दोनों आलम से अयाँ था मुझे मा'लूम न था
तू ही तो जल्वा-कुनाँ था मुझे मा'लूम न था

क़ल्ब-ए-मुज़्तर में मिरे मेहर-ओ-वफ़ा की सूरत
नूर का एक जहाँ था मुझे मा'लूम न था

दर्द-ए-कौनैन उठा रक्खा था अल्लाह अल्लाह
दिल मिरा कितना जवाँ था मुझे मा'लूम न था

तू मिरी महफ़िल-ए-अफ़्कार सजाने के लिए
रूह में नूर फ़शाँ था मुझे मा'लूम न था

ज़ीनत-ए-फ़र्श रहा या सर-ए-क़ौसैन रहा
तेरा महबूब कहाँ था मुझे मा'लूम न था

जो बहा फ़र्त-ए-नदामत से हुज़ूरी में तिरी
कितना वो अश्क गराँ था मुझे मा'लूम न था

लाला-ओ-गुल में फ़ज़ाओं में मह-ओ-अंजुम में
तेरा ही नूर निहाँ था मुझे मा'लूम न था

बाग़-ए-हस्ती में जला मेरा वजूद-ए-हस्ती
सूरत-ए-फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ था मुझे मा'लूम न था
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Jalee Amrohvi
दिल है वाबस्ता मिरा हसरत-ए-नाकाम के साथ
ताज़ा हो जाते हैं सब ज़ख़्म तिरे नाम के साथ

उस ने हर हलक़-ए-तमन्ना पे चलाया ख़ंजर
यूँ है पैकार मिरी गर्दिश-ए-अय्याम के साथ

दर्द-ए-उल्फ़त मिरा करता है तरन्नुम-रेज़ी
किरनें रो रो के गले मिलती हैं जब शाम के साथ

संग बन जाता अगर मैं भी बरा-ए-इशरत
ज़िंदगी फिर तो गुज़रती बड़े आराम के साथ

हर जिहत से रहा दुनिया में सरासर नाकाम
जी रहा हूँ मैं ख़ुशी से इसी इल्ज़ाम के साथ

राही-ए-ज़ीस्त अगर अज़्म-ए-सफ़र है पुर-जोश
फिर तो वाबस्ता है मंज़िल तिरे हर गाम के साथ

ये बना देता है इंसाँ को मुकम्मल पत्थर
यूँ रही दहर में नफ़रत मुझे आराम के साथ

आतिश-ए-ग़म ने तपा कर किया कुंदन मुझ को
इसी बाइ'स तो 'जली' इश्क़ है आलाम के साथ
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