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खेल अबकी बार आर-पार चाहिए
और एक दिल मुझे उधार चाहिए
और एक दिल मुझे उधार चाहिए
आरज़ू तिरी है पर तिरी ही ज़िद नहीं
फिर तू क्यूँ मुझे ही बार बार चाहिए
जानता हूँ सच है क्या या क्या ये झूठ है
फ़ैसले को तुझ सा राज़दार चाहिए
मैं निकल चलूँगा इक सियाह रात में
साथ कोई तुझ सा ताबदार चाहिए
बैठा मेरे साथ हैं तो मुझ से बात कर
मुझ को कोई मुझ सा ग़म-गुसार चाहिए
यार तेरे शहर में मैं आ तो जाऊँ पर
मिलने को तो तेरा इख़्तियार चाहिए
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निकला है जो घर से वो कभी घर नहीं आता
इक ख़्वाब ही तो है जो मुकर्रर नहीं आता
इक ख़्वाब ही तो है जो मुकर्रर नहीं आता
जो डर रहा ज़ुल्मत से हो तो ये कहो उस से
लौ दिखने से वो रात का मंज़र नहीं आता
जब गिर कोई जाए जो निगाहों में ही अपनी
वो शख़्स किसी के भी बराबर नहीं आता
आ जाते हैं हिस्से में जो जब फर्ज़ अदा करने
फिर हिस्से में उन के कभी भी घर नहीं आता
जो वो मिले 'पारस' कभी तो पूछना उस से
क्यूँ दरिया की ही ओर समुंदर नहीं आता
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बात करता हूँ कभी आवाज़ देता हूँ
अपने ख़्वाबों को नई परवाज़ देता हूँ
अपने ख़्वाबों को नई परवाज़ देता हूँ
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पास होना उस का काफ़ी होता है
यूँही तो बस जीना काफ़ी होता है
यूँही तो बस जीना काफ़ी होता है
हो महल गर तो भी कम पड़ जाता है
रहने को इक कमरा काफ़ी होता है
ये ज़रूरी तो नहीं हासिल भी हो
चाँद का बस दिखना काफ़ी होता है
हँसने को तो दुनिया कम पड़ जाती है
रोने को इक कंधा काफ़ी होता है
ग़ैरों पर पारस यक़ीं हो जाता है
धोखे को इक अपना काफ़ी होता है
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