Qaisar Siddiqi

Qaisar Siddiqi

@qaisar-siddiqi

Qaisar Siddiqi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qaisar Siddiqi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Nazm
आलम-ए-बे-चेहरगी में कौन किस का आश्ना
आज का हर लफ़्ज़ है मफ़्हूम से ना-आश्ना

कौन होता है ज़माने में किसी का आश्ना
लोग होना चाहते हैं ख़ुद ज़माना-आश्ना

सोचता हूँ कौन सी मंज़िल है ये इदराक की
ज़र्रा ज़र्रा आश्ना है पत्ता पत्ता आश्ना

चाट जाती है जिन्हें सूरज की प्यासी रौशनी
काश हो जाएँ किसी दिन वो भी दरिया-आश्ना

तिश्नगी आई सराबों से गुज़र कर आब तक
साहिल-ए-दरिया मगर अब तक है सहरा-आश्ना

ज़ौक़-ए-ख़ुद-बीनी की तस्कीन-ए-अना के वास्ते
कितने ही ना-आश्नाओं को बनाया आश्ना

काश हो जाए तिरी आँखों पे ख़्वाबों का नुज़ूल
काश हो जाए तिरा दिल भी तमन्ना-आश्ना

कौन पहचानेगा हम को कौन पूछेगा मिज़ाज
कौन है अपने सिवा 'क़ैसर' हमारा आश्ना
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Qaisar Siddiqi
हमारे ज़ेहन में महशर बपा है क्या किया जाए
ये दिल आमादा-ए-तर्क-ए-वफ़ा है क्या किया जाए

मुसलसल बारिश-ए-संग-ए-सदा है क्या किया जाए
यही मेरी वफ़ाओं का सिला है क्या किया जाए

लबों तक आ के सब हर्फ़-ए-शिकायत टूट जाते हैं
अजब अंदाज़ से वो देखता है क्या किया जाए

बिछड़ कर आप से जीने की ख़्वाहिश कुफ़्र है लेकिन
हमारी ज़िंदगी ही बे-हया है क्या किया जाए

ये माना ख़्वाब है ऐ ज़ख़्म-ए-नौ तेरी ख़लिश लेकिन
यहाँ पहले ही इक मेला लगा है क्या किया जाए

हमेशा सोचते रहना भी कुछ अच्छा नहीं होता
मगर शाइ'र हमेशा सोचता है क्या किया जाए

वो इंसाँ जो मिरा हमराज़ है हम-ज़ाद है 'क़ैसर'
वो मुझ से आज तक ना-आश्ना है क्या किया जाए
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Qaisar Siddiqi
रौशनी सुब्ह की या शब की स्याही देंगे
जो भी देना है तुम्हें ज़िल्ल-ए-इलाही देंगे

शैख़ साहब तो अज़ल से हैं दुश्मन मेरे
खा के क़ुरआँ की क़सम झूटी गवाही देंगे

उन से रखिए न किसी मेहर-ओ-वफ़ा की उम्मीद
ये तो ऐसे हैं कि सूरज को स्याही देंगे

मौसम-ए-लुत्फ़-ए-अता है अभी मयख़ाने में
जाम क्या चीज़ है ये तुम को सुराही देंगे

तो हिक़ारत की नज़र से न उन्हें देख मियाँ
ये फटे कपड़े तुझे ख़िलअ'त-ए-शाही देंगे

ऐसा लगता है हवाओं के ये पागल झोंके
रेत पर लिक्खी इबारत को मिटा ही देंगे

इतनी मायूसी भी अच्छी नहीं खोटे सिक्को
इक न इक दिन तुम्हें हम लोग चला ही देंगे

करके ये फ़ैसला हम घर से चले हैं 'क़ैसर'
कुछ खरी खोटी तुम्हें आज सुना ही देंगे
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Qaisar Siddiqi
न तर्ज़-ए-ख़ास न अंदाज़-ए-गुल-फ़िशाँ ले कर
पुकारता हूँ मैं तुझ को तिरी ज़बाँ ले कर

तमाम हुस्न-ए-तमन्ना धुआँ धुआँ ले कर
निगाह बुझ ही गई रात का समाँ ले कर

मिरी बहार-ए-तमन्ना को जावेदाँ कर दे
मैं क्या करूँँगा भला उम्र-ए-राएगाँ ले कर

तुम्हारे बज़्म का दस्तूर चाहे जो भी हो
तुम्हारी बज़्म में आया हूँ मैं ज़बाँ ले कर

अब और कितना तमाशा बनाएगी क़िस्मत
फिरूँ मैं अपना जनाज़ा कहाँ कहाँ ले कर

मुझे ही रास न आई ये बद-नसीब ज़बाँ
तो क्या करोगे मियाँ तुम मिरी ज़बाँ ले कर

ये पस्तियों की लकीरें न छू सकेंगी मुझे
मैं घर से निकला हूँ आँखों में आसमाँ ले कर

सुहाग जिस की जुदाई में उजड़ा उजड़ा है
कभी तो लौटेगा सोने की चूड़ियाँ ले कर

तुम्हारा आइना कैसे न एहतिराम करे
मिरी ग़ज़ल भी तो आई है कहकशाँ ले कर

ख़िरद की रेशम-ओ-अतलस-नवाज़ महफ़िल में
जुनूँ चला है गरेबाँ की धज्जियाँ ले कर

मिज़ाज बच्चों के जैसा है अब भी 'क़ैसर' का
बहुत ही ख़ुश है वो काग़ज़ की तितलियाँ ले कर
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Qaisar Siddiqi
सितारे जब किसी महताब का क़िस्सा सुनाते हैं
मिरे ख़्वाबों के आँगन में उजाले मुस्कुराते हैं

हक़ीक़त सामने लाने से जब दामन बचाते हैं
तो गिर कर आइने हाथों से ख़ुद ही टूट जाते हैं

हमें तो मुस्कुराने के सिवा कुछ भी नहीं आता
हुजूम-ए-ग़म में भी हम लोग यूँँ ही मुस्कुराते हैं

चलो ऐ बादा-ख़्वारो चल के उन की ख़ैरियत पूछें
सुना है शैख़ साहब मय-कदे में पाए जाते हैं

मोहब्बत में नदामत के सिवा कुछ भी नहीं पाया
मगर फिर भी मोहब्बत से कहाँ हम बाज़ आते हैं

तुम ही रूठे हुए हो जब हमारे दिल की दुनिया से
चलो फिर हम भी अपनी ज़िंदगी से रूठ जाते हैं

यही है फ़र्क़ ज़ाहिद और 'आशिक़ की इबादत में
ये अपना सर झुकाता है वो अपना दिल झुकाते हैं

मिरी उम्मीद अक्सर चाहती है सुर्ख़-रू होना
मगर हालात अक्सर मुझ को आईना दिखाते हैं
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Qaisar Siddiqi
मुँह फेर कर वो सब से गया भी तो क्या गया
कम-बख़्त सारे शहर को पागल बना गया

पत्थर को बोलने की अदाएँ सिखा गया
वो शख़्स कैसे कैसे तमाशे दिखा गया

उस को यहाँ से जाने का बेहद मलाल था
मुड़ मुड़ के अपने घर की तरफ़ देखता गया

दुनियाए-ख़्वाब और हक़ीक़त के दरमियाँ
थोड़ा जो फ़ासला था उसे भी मिटा गया

सब जानते हुए भी मैं अंजान ही रहा
इस ने समझ लिया कि मैं धोके में आ गया

ये कौन दे रहा है दर-ए-दिल पे दस्तकें
ये कौन मेरे ख़्वाब की दीवार ढा गया

कुछ और पूछने की ज़रूरत नहीं रही
हल्के से मुस्कुरा के वो सब कुछ बता गया

दे तो गया अज़ाब-ए-जुदाई मुझे मगर
गिर्हें जो दिल में थीं वो उन्हें खोलता गया

कोई भी उज़्र-ए-लंग की सूरत नहीं रही
लो अब तुम्हारे सामने आईना आ गया

जिस का हर एक नक़्श कफ़-ए-पा है आइना
इस राह-रौ को ढूँडने ख़ुद रास्ता गया
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Qaisar Siddiqi
मेरे बअ'द और कोई मुझ सा न आया होगा
उस के दरवाज़े पे अब तक मिरा साया होगा

जब भी आईने ने मुँह उस को चिढ़ाया होगा
कैसे ख़्वाबों की हक़ीक़त को छुपाया होगा

उस ने भरपूर नज़र जिस पे भी डाली होगी
चाँद ने उस को कलेजे से लगाया होगा

किस तरह क़त्ल किया होगा मिरी यादों को
कितनी मुश्किल से मुझे उस ने भुलाया होगा

जब चली होगी कहीं बात किसी शाइ'र की
उस के होंटों पे मिरा नाम तो आया होगा

जो मिरे बारे में सोचेगा हर इक पहलू से
वो मिरा अपना नहीं होगा पराया होगा

उस की पलकों का तबस्सुम ये पता देता है
उस ने आँखों में कोई ख़्वाब सजाया होगा

सोचता हूँ कि वो इंसान ब-नाम-ए-हस्ती
कैसे अँगारों की बारिश में नहाएा होगा

ज़िंदगी उस की सुलगता हुआ सहरा होगी
जो तिरी आँखों पे ईमान न लाया होगा

तेरी आँखों में समाया है जो रंगों की तरह
हो न हो मेरे ख़यालात का साया होगा

तुम ने 'क़ैसर' मिरे एहसास के वीराने में
मेरे ख़्वाबों को तड़पता हुआ पाया होगा
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Qaisar Siddiqi
ज़ुल्फ़ों के साए में आ कर चैन मिला है पहली बार
मेरी प्यासी आँखों ने दरिया देखा है पहली बार

प्यार किसे कहते हैं ये एहसास हुआ है पहली बार
मेरे दिल में मीठा मीठा दर्द उठा है पहली बार

मेहंदी वाली चाहत का पैग़ाम मिला है पहली बार
उस ने अपने हाथ पे मेरा नाम लिखा है पहली बार

पहली बार सुनाई दी है दिल के धड़कने की आवाज़
देख के तेरी भोली सूरत दिल मचला है पहली बार

पहली बार तरस आया है उस को मेरी हालत पर
प्यार की नज़रों से वो मुझ को देख रहा है पहली बार

चाँद उतर आया है मेरे ख़्वाबों की अँगनाई में
घूँघट वाली रात का जादू दिल पे चला है पहली बार

उस के प्यार में 'क़ैसर' साहब आज तिलक मैं ज़िंदा हूँ
जिस ने मेरे अरमानों को क़त्ल किया है पहली बार
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Qaisar Siddiqi
तुम ख़्वाब में आओगे ये मालूम नहीं था
फिर ख़्वाब दिखाओगे ये मालूम नहीं था

तुम काबे को ढाओगे ये मालूम नहीं था
दिल तोड़ के जाओगे ये मालूम नहीं था

जिस ख़त में टंके थे मिरे अश्कों के सितारे
वो ख़त भी जलाओगे ये मालूम नहीं था

कुछ अक्स मिरे आईना-ख़ाने से चुरा कर
मुझ को ही दिखाओगे ये मालूम नहीं था

क़द मेरा घटाओगे मुझे इस की ख़बर थी
साए को बढ़ाओगे ये मालूम नहीं था

ये तो मुझे मालूम था तुम जाओगे लेकिन
इस तरह से जाओगे ये मालूम नहीं था

इक लम्हे की आवारा-निगाही के सहारे
दिल में उतर आओगे ये मालूम नहीं था

तुम होली भी खेलोगे मिरे दिल के लहू से
दामन भी बचाओगे ये मालूम नहीं था

हैरत में हैं अहबाब कि इस उम्र में क़ैसर
यूँँ धूम मचाओगे ये मालूम नहीं था
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