Qaisar Siddiqi

Top 10 of Qaisar Siddiqi

    कहाँ हो ग़ालिबो, मीरो 'नज़ीरो'
    कहाँ हो मेरी ज़ुल्फ़ों के असीरो
    मेरी सहबा के पैमानौ, कहाँ हो
    कहाँ हो मेरे दीवानो कहाँ हो
    कहाँ हो आलिमो मसनद-नशीनो
    मिरे ख़्वान-ए-अता के रेज़ा-चीनो!
    सिला कुछ तो वफ़ा का दो कहाँ हो
    कहाँ हो मेरे शहज़ादो कहाँ हो
    कहाँ हो ऐ मिरे दर के गदाओ
    कम-अज़-कम अपनी सूरत तो दिखाओ
    कि में लाचार हो कर रह गई हूँ
    बहुत बीमार हो कर रह गई हूँ
    कहाँ हो ऐ क़लम-कारो, जियालो?
    मुझे कुर्सी-नशीनों से बचा लो
    ये मुझ से दूर होते जा रहे हैं
    बहुत मग़रूर होते जा रहे हैं
    मिरी रोटी पे होता है गुज़ारा
    मगर छोड़ा है मुझ को बे-सहारा
    सिला अपनी वफ़ा का पा चुकी हूँ
    में उन के घर से राँदी जा चुकी हूँ
    हक़ीक़त है कि में उस की अमीं हूँ
    ये घर मेरा है लेकिन मैं नहीं हूँ
    मिरे ही नाम से ओहदा मिला है
    मिरे सदक़े में इन का तनतना है
    मगर ये मुझ को खाते जा रहे हैं
    मिरी हस्ती मिटाते जा रहे हैं
    सुहागन थी अभागन हो गई हूँ
    में दर दर की भिकारन हो गई हूँ
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    वो रुख़्सत की घड़ी वो दीदा-ए-नम याद आते हैं
    न जाने आज क्यूँ भूले हुए ग़म याद आते हैं

    ये चश्म-ए-दोस्त की साज़िश नहीं तो और फिर क्या है
    कि मेरे मुंदमिल ज़ख़्मों के मरहम याद आते हैं

    हुआ है जब से दिल सैद-ए-सितम-हा-ए-ग़म-ए-दौराँ
    वो याद आते तो हैं लेकिन बहुत कम याद आते हैं

    यहाँ हम ग़म ग़लत करने को आए थे मगर साक़ी
    क़यामत है कि मयख़ाने में भी ग़म याद आते हैं

    कोई जब छेड़ता है क़िस्सा-ए-दार-ओ-रसन 'क़ैसर'
    तो दीवानों को उन की ज़ुल्फ़ के ख़म याद आता है
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    जब तिरी यादों की पुर्वाई ग़ज़ल गाती है
    फूल खिल उठते हैं तन्हाई ग़ज़ल गाती है

    रक़्स करती हुई आती है तिरे जिस्म की याद
    तेरी टूटी हुई अँगड़ाई ग़ज़ल गाती है

    गुदगुदाती है तसव्वुर को तिरे रूप की धूप
    मेरे जज़्बात की शहनाई ग़ज़ल गाती है

    एक मुद्दत हुई इस राह से गुज़रा था कोई
    आज तक दिल की ये अँगनाई ग़ज़ल गाती है

    नग़्में सरगोशी के लहराते हैं पनघट पनघट
    तोहमतें हँसती हैं रुस्वाई ग़ज़ल गाती है

    झूम झूम उठता है साक़ी तिरे 'क़ैसर' का ख़याल
    जब तिरी आँखों की गहराई ग़ज़ल गाती है
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    इल्ज़ाम कुछ न कुछ तो मिरे सर भी आएगा
    आँगन में पेड़ होगा तो पत्थर भी आएगा

    सूरज के ग़ुस्ल करने का मंज़र भी आएगा
    इन जंगलों के बा'द समुंदर भी आएगा

    सामाँ जराहतों के भी हम साथ ले चलें
    इस रास्ते में शहर-ए-सितमगर भी आएगा

    वो साँप जिस को दूध पिलाती है दुश्मनी
    थैली से एक रोज़ वो बाहर भी आएगा

    पलकों पे अपनी ख़्वाब-ए-तजल्ली सजाइए
    शाम आई है तो रात का लश्कर भी आएगा

    जो साया खेलता है अभी मेरी गोद में
    इक दिन वो मेरे क़द के बराबर भी आएगा

    इस दोपहर की धूप को शायद ख़बर नहीं
    सहरा में कोई मोम का पैकर भी आएगा

    जब तुम नहीं तो उस का भी क्या काम है यहाँ
    तुम आओगे तो बज़्म में 'क़ैसर' भी आएगा
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    घर से मैं जब भी अकेला निकला
    मुझ से पहले मिरा साया निकला

    फाड़ कर दामन-ए-सहरा निकला
    मेरे अंदर से जो दरिया निकला

    इक तबस्सुम जो मिला था मुझ को
    वो भी इक ज़ख़्म-ए-तमन्ना निकला

    जिस पे कल संग-ए-मलामत बरसे
    आज वो दार पे ईसा निकला

    आइना देखा जो उर्यां हो कर
    जिस्म ही जिस्म का पर्दा निकला

    जिस ने ये भीड़ लगा रक्खी थी
    ख़ुद वो उस भीड़ में तन्हा निकला

    चेहरा ईजाद है आईने की
    आइना निकला तो चेहरा निकला

    आज इक ख़त को जो खोला 'क़ैसर'
    उस में सूरज का सरापा निकला
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    इक भीड़ है जल्वों की और मेरी नज़र तन्हा
    है आइना-ख़ाने में ख़ुद आइना-गर तन्हा

    उन पाँव के छालों से पूछो ये बताएँगे
    तय कैसे किया हम ने शो'लों का सफ़र तन्हा

    जलते हुए मौसम में इस तरह वो हँसता है
    सहरा में हँसे जैसे कोई गुल-ए-तर तन्हा

    क्या जानिए क्यूँ मुझ पर ये ख़ास इनायत है
    क्या जानिए जलता है क्यूँ मेरा ही घर तन्हा

    इक शोर-ए-क़यामत है और भीड़ है चेहरों की
    इस दौर में रहता है हर शख़्स मगर तन्हा

    तन्हाई का ग़म तुम को उस वक़्त मज़ा देगा
    मेरी ही तरह तुम भी हो जाओ अगर तन्हा
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    फ़ज़ाओं से गुज़रता जा रहा हूँ
    ख़लाओं में बिखरता जा रहा हूँ

    मैं रेगिस्तान में बैठा हूँ लेकिन
    समुंदर में उतरता जा रहा हूँ

    ज़माना लम्हा लम्हा जी रहा है
    मैं लम्हा लम्हा मरता जा रहा हूँ

    वो जितने दूर होते जा रहे हैं
    मैं उतना ही सँवरता जा रहा हूँ

    चला हूँ अपने से दो हात करने
    मगर ख़ुद से भी डरता जा रहा हूँ

    मैं नुक़्ता बन के इक मरकज़ पे यारो
    न जाने क्यूँ ठहरता जा रहा हूँ

    मिटाने पर भी मैं उर्दू की मानिंद
    सँवरता और निखरता जा रहा हूँ

    मैं काली झील में डूबा था ख़ुद ही
    मगर ख़ुद ही उभरता जा रहा हूँ

    मैं 'क़ैसर' अपनी आँखों से टपक कर
    किसी दिल में उतरता जा रहा हूँ
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    ख़्वाब जो देखे हैं मैं ने उन्हें पैकर देगा
    मेरा सहरा मुझे इक रोज़ समुंदर देगा

    एक क़तरा जो लरज़ता है मिरी पलकों पर
    ज़र्द मौसम को यही क़तरा हरा कर देगा

    मुझ को कुछ और फ़ज़ाओं में बिखर जाने दो
    मेरा एहसास ख़लाओं में मुझे घर देगा

    हूँ गुनहगार मगर इतना गुनहगार नहीं
    मुझ को देगा भी तो वो फूल सा पत्थर देगा

    सोचता हूँ तो थकन और भी बढ़ जाती है
    फिर मुझे इज़्न-ए-सफ़र हर्फ़-ए-मुकर्रर देगा

    इसी आलम में मिरे ख़्वाबों की दुनिया भी है
    मेरी दुनिया को भी वक़्त एक पयम्बर देगा

    मेरे हमराज़ मिरे दोस्त मिरे साथ न चल
    लम्हा लम्हा तुझे आवाज़ की ठोकर देगा
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    जब भी मुझ को अपना बचपन याद आता है
    बचपन के इक प्यार का बचपन याद आता है

    देख के इस मुँह-ज़ोर जवानी की मुँह-ज़ोरी
    मुझ को इस का तोतला बचपन याद आता है

    औरत माँ थी बहन थी दादी थी नानी थी
    कोरे काग़ज़ जैसा बचपन याद आता है

    तूफ़ानी बारिश घर में सैलाब का आलम
    ठंडा चूल्हा भूका बचपन याद आता है

    तन्हाई का दुख तो कम हो किसी बहाने
    देखें किस का किस का बचपन याद आता है

    शहद के जैसी मीठी बोली याद आती है
    दूध के जैसा उजला बचपन याद आता है

    बचपन के यारों से मिलता रहता हूँ मैं
    'क़ैसर' मुझ को सब का बचपन याद आता है
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    मन भी शाइ'र की तरह तन भी ग़ज़ल जैसा है
    ये तिरे रूप का दर्पन भी ग़ज़ल जैसा है

    रेशमी चूड़ियाँ ऐसी कि ग़ज़ल के मिसरे
    ये खनकता हुआ कंगन भी ग़ज़ल जैसा है

    इन लचकती हुई ज़ुल्फ़ों में है गोकुल का समाँ
    ये महकता हुआ सावन भी ग़ज़ल जैसा है

    लोग-गीतों की तरह तू भी रसीली है मगर
    मेरी सजनी तिरा साजन भी ग़ज़ल जैसा है

    मेरे जज़्बात की शोख़ी भी ग़ज़ल जैसी है
    मेरे एहसास का बचपन भी ग़ज़ल जैसा है

    देख कर तुझ को ग़ज़ल कैसे न लिक्खे 'क़ैसर'
    तू ग़ज़ल जैसी है यौवन भी ग़ज़ल जैसा है
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