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Top 10 of Qamar Raza Shahzad

Qamar Raza Shahzad

Top 10 of Qamar Raza Shahzad

    तिरी तन्हाई का दुख आश्कारा हो रहा है
    बिछड़ती साअ'तों में तू हमारा हो रहा है

    हिसाब-ए-दोस्ताँ दर-दिल अगर है तो न जाने
    यहाँ अब क्या मुरत्तब गोशवारा हो रहा है

    अज़ाब-ए-मस्लहत की क़ैद में हैं लोग और तू
    समझता है यहाँ सब का गुज़ारा हो रहा है

    कहीं से इक कड़ी गुम है हमारी गुफ़्तुगू में
    ब-ज़ाहिर तो ये दुख तर्सील सारा हो रहा है

    अगर कोई नहीं है आईने के पार 'शहज़ाद'
    तो फिर ये कौन हम पर आश्कारा हो रहा है
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    किसी पे अपना कमाल ज़ाहिर नहीं करेगा
    वो फ़त्ह से पहले चाल ज़ाहिर नहीं करेगा

    जिलौ में ले कर चलेगा लश्कर मगर अदू पर
    वो अपना जल्वा जलाल ज़ाहिर नहीं करेगा

    उसे कभी गुफ़्तुगू की मोहलत नहीं मिलेगी
    जो आज भी दिल का हाल ज़ाहिर नहीं करेगा

    ये दिल कि शफ़्फ़ाफ़ आइना ही सही मगर अब
    तिरा मुकम्मल जमाल ज़ाहिर नहीं करेगा

    उसे हुई है ये पहली पहली शिकस्त 'शहज़ाद'
    अभी वो अपना मलाल ज़ाहिर नहीं करेगा
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    अजीब दुख है लबों पर गिला कोई भी न था
    बिछड़ते वक़्त किसी से ख़फ़ा कोई भी न था

    हर एक शख़्स को सच्चे हुरूफ़ अज़बर थे
    किसी के पास मगर मो'जिज़ा कोई भी न था

    ब-नाम-ए-हुस्न सभी गुफ़्तुगू कमाल की थी
    ये और बात सर-ए-आइना कोई भी न था

    अज़ाब-ए-ज़ेहन थी इक मेहर आब-ओ-दाने पर
    तिरे नगर में ख़ुशी से रहा कोई भी न था

    पस-ए-ज़मीर अदालत सभी को हासिल थी
    मगर ब-वक़्त-ए-ज़रूरत खरा कोई भी न था
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    हम ने हर ग़म दिल-ए-सद-चाक से बाहर रक्खा
    आग को पैरहन-ए-ख़ाक से बाहर रक्खा

    ज़ेब-ए-तन हम ने भी कर रक्खी ये दुनिया लेकिन
    तेरे हर रंग को पोशाक से बाहर रक्खा

    ख़्वाब-दर-ख़्वाब तुझे ढूँडने वालों ने भी अब
    नींद को दीदा-ए-नमनाक से बाहर रक्खा

    इक तरह ध्यान ही ऐसा कि जिसे हम ने यहाँ
    नफ़अ' नुक़सान के पेचाक से बाहर रक्खा

    उजरत-ए-इश्क़ बहुत कम थी सौ हम ने 'शहज़ाद'
    दिल को इस तंगी-ए-अफ़्लाक से बाहर रक्खा
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    अलम-ब-दस्त कहीं आइना-ब-कफ़ हूँ मैं
    तिरे ख़िलाफ़ हर इक सम्त सफ़-ब-सफ़ हूँ मैं

    मुझे तलाश न कर तू कि इक ज़माना हुआ
    किताब-ए-इश्क़ के हर बाब से हज़फ़ हूँ मैं

    हज़ार भेस बदलता रहूँ मगर इस पार
    किसी चमकती हुई आँख का हदफ़ हूँ मैं

    बदलता रहता हूँ हर लम्हा अपने ख़द-ओ-ख़ाल
    कहीं गुहर कहीं दरिया कहीं सदफ़ हूँ मैं

    डटा हुआ हूँ अभी तक महाज़ पर 'शहज़ाद'
    अगरचे हारे हुए शाह की तरफ़ हूँ मैं
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    लहू में डूबा हुआ पैरहन चमकता है
    सुलगती रेत पर इक गुल-बदन चमकता है

    सितारे बुझते चले जा रहे हैं ख़ेमों में
    बस इक चराग़ सर-ए-अंजुमन चमकता है

    ज़ईफ़ चुन तो रहा है जवान लाशों को
    मगर निगाह में इक बाँकपन चमकता है

    ये कैसे फूल झड़े शीर-ख़ार होंटों से
    कि जिन के नूर से सारा चमन चमकता है

    ये कौन माह-ए-मुनव्वर असीर है 'शहज़ाद'
    ये किस का हल्क़ा-ए-तौक़-ओ-रसन चमकता है
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    मिरी ज़मीं तिरे अफ़्लाक से ज़ियादा है
    मुझे ये ख़ाक हर इक ख़ाक से ज़ियादा है

    निगार-ख़ाना-ए-दुनिया मुझे दरीदा लिबास
    तिरी अता-शुदा पोशाक से ज़ियादा है

    शिकस्ता जिस्म अलग चीज़ है मगर तिरा ज़ुल्म
    कहाँ मिरे दिल-ए-बे-बाक से ज़ियादा है

    कहानी-कार तुझे क्या ख़बर ये शहर दुखी
    तिरे फ़साना-ए-ग़म-नाक से ज़ियादा है

    मैं बुझ रहा हूँ मगर मेरी रौशनी 'शहज़ाद'
    चराग़-ए-खेमा-ए-इदराक से ज़ियादा है
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    किसी से वादा-ओ-पैमान भी नहीं मेरा
    यहाँ से लौटना आसान भी नहीं मेरा

    मैं लख़्त लख़्त हुआ आसमाँ से लड़ते हुए
    मगर ये ख़ाक पे एहसान भी नहीं मेरा

    मैं सिर्फ़ अपनी हिरासत में दिन गुज़ारता हूँ
    मिरे सिवा कोई ज़िंदान भी नहीं मेरा

    सुकूत-ए-शब में तिरी चश्म-ए-नीम-वा के सिवा
    कोई चराग़ निगहबान भी नहीं मेरा

    धरी हुई कोई उम्मीद भी नहीं मिरे पास
    खुला हुआ दर-ए-इम्कान भी नहीं मेरा

    ये किस के बोझ ने मुझ को थका दिया कि यहाँ
    ब-जुज़-दुआ कोई सामान भी नहीं मेरा

    मैं उस की रूह में उतरा हुआ हूँ और 'शहज़ाद'
    कमाल ये है उसे ध्यान भी नहीं मेरा
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    नफ़ी को कर्या-ए-इस्बात से निकालता हूँ
    मैं अपनी ज़ात तिरी ज़ात से निकालता हूँ

    कशीद करता हूँ मैं दिन की आग से ठंडक
    और अपनी धूप कहीं रात से निकालता हूँ

    तू एक रुख़ पे है महव-ए-कलाम लेकिन मैं
    कई मआ'नी तिरी बात से निकालता हूँ

    दु'आ के हाले बना कर तिरे जमाल के गिर्द
    तुझे मैं गर्दिश-ओ-आफ़ात से निकालता हूँ

    मिरा कमाल मैं अपनी बुलंदियाँ 'शहज़ाद'
    हक़ीर-ओ-पस्त मक़ामात से निकालता हूँ
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    हमेशा जीतने वाला कभी तो हारा भी हो
    मोहब्बतों में कोई फ़ैसला हमारा भी हो

    मैं इस किनारे पे बैठा हूँ और सोचता हूँ
    मिरी गिरफ़्त में दरिया का वो किनारा भी हो

    ये शहर छोड़ना मुश्किल तो है मगर सर-ए-दस्त
    किसी को मेरा ठहरना यहाँ गवारा भी हो

    मुझे क़ुबूल नहीं तोहमत-ए-दुआ और वो
    ये चाहता है किसी ने उसे पुकारा भी हो

    मैं आफ़्ताब नहीं हूँ मगर कभी 'शहज़ाद'
    मिरे मदार में उस शख़्स का सितारा भी हो
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    Qamar Raza Shahzad
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