Qamar Siwani

Qamar Siwani

@qamar-siwani

Qamar Siwani shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qamar Siwani's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
ज़माना देता है जिस को वक़ार की ख़ुशबू
तवाफ़ करती है उस का बहार की ख़ुशबू

हमारे हिस्से में आई जो ख़ार की ख़ुशबू
बहुत ही ख़ुश थी चमन की बहार की ख़ुशबू

ख़ुलूस-ए-दिल के गुलों के निखार की ख़ुशबू
वफ़ा के जिस्म से आती है प्यार की ख़ुशबू

चुभा है उस की हथेली में कोई ख़ार ज़रूर
चमन में चीख़ रही है बहार की ख़ुशबू

ज़बान प्यार की ख़ुशबू की मैं समझता हूँ
मिरी ज़बान समझती है प्यार की ख़ुशबू

सुना रही है पुरानी शराब का क़िस्सा
दिमाग़ चाट रही है ख़ुमार की ख़ुशबू

तुम्हारे ज़ह्न में खिलते नहीं ख़ुलूस के फूल
कहाँ से दोगे मुझे ए'तिबार की ख़ुशबू

ज़बान कौन मोहब्बत की बोलता है यहाँ
पसंद किस को है मेरे दयार की ख़ुशबू

सफ़र की सारी थकावट 'क़मर' मैं भूल गया
पहुँच के घर जो मिली मुझ को प्यार की ख़ुश्बू
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Qamar Siwani
दिल पर निगाह-ए-नाज़ का जादू जो चल गया
वो सरहद-ए-शुऊ'र से आगे निकल गया

छत पर मिरी उतरती नहीं धूप आज-कल
सूरज मिरे ख़िलाफ़ कोई चाल चल गया

लोगों ने मुझ को अपनी नज़र से गिरा दिया
जिस दिन से मैं ख़ुलूस के साँचे में ढल गया

क्यों हँसते हँसते आँख से आँसू निकल पड़े
क्यों यक-ब-यक बहार का मौसम बदल गया

गौहर जिसे समझते थे सब लोग शहर में
परखा गया उसे तो वो पत्थर निकल गया

आई थी बन के आग मिरे वास्ते बहार
जिस फूल को भी मैं ने छुआ हाथ जल गया

सच बोलता नहीं है कोई शख़्स आज-कल
देखा जो मेरा हश्र ज़माना सँभल गया

रखते थे फूँक फूँक के जब अपना हर क़दम
रस्ते में कैसे पाँव तुम्हारा फिसल गया

उम्मीद जिन से अम्न की बारिश की थी 'क़मर'
उन बादलों को वक़्त का सूरज निगल गया
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Qamar Siwani
गौहर-ए-नायाब को कहता है पत्थर आदमी
पत्थरों को कहता है नायाब गौहर आदमी

तुम करो ये फ़ैसला कब उस से मिलना चाहिए
दिन में खिलता फूल है शब में है ख़ंजर आदमी

मेरे चेहरे को बख़ूबी राज़ ये मालूम है
आदमी कब आइना है कब है पत्थर आदमी

अपनी आँखें बंद करके करता है जब भी सफ़र
रास्ते में खाता है ठोकर पे ठोकर आदमी

ख़ब्त का गहरा समुंदर सब्र का ऊँचा पहाड़
आँख में रखता है कैसा कैसा मंज़र आदमी

जब जलाता है ग़रीबों को सितम की आग में
उस घड़ी होता है सूरज के बराबर आदमी

आगे है दलदल की बस्ती पीछे है शहर-ए-शरर
छोड़ कर आख़िर किधर जाए समुंदर आदमी

आने वाला है कोई तूफ़ान बहर-ए-वक़्त में
अपनी अपनी नाव का बन जाए लंगर आदमी

आसमाँ की वुसअ'तों से पूछ ले जा कर 'क़मर'
कब दिखाई देता है गहरा समुंदर आदमी
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Qamar Siwani
ख़ुदी के बाग़ के फूलों की ताज़गी हूँ मैं
बहार-ए-हुस्न-ए-तमद्दुन की दिलकशी हूँ मैं

ज़मीर-ए-ज़र्फ़ हूँ तहज़ीब-ए-आजिज़ी हूँ मैं
मिज़ाज-ए-सब्र-ओ-तहम्मुल की सादगी हूँ मैं

न चाँद हूँ न सितारा न चाँदनी हूँ मैं
चराग़-ए-अज़्मत-ए-ग़ैरत की रौशनी हूँ मैं

सुलगती धूप की ख़ातिर हूँ छाँव राहत की
अदब की ख़ुश्क ज़मीं के लिए नमी हूँ मैं

ख़ुलूस वाले को पहचानता नहीं कोई
नई सदी की निगाहों में अजनबी हूँ मैं

किसी अमीर का एहसाँ लिया न मैं ने कभी
ख़ुदी को नाज़ है जिस पर वो आदमी हूँ मैं

अमीर-ए-शहर से मेरा कोई लगाव नहीं
ग़रीब-ए-शहर से निस्बत है मुफ़्लिसी हूँ मैं

वफ़ा के गहरे समुंदर से मेरा रिश्ता है
'क़मर' ख़ुलूस की बहती हुई नदी हूँ मैं
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Qamar Siwani
चाँद निकलेगा तो घर घर में उजाले होंगे
चाँदनी रात में सब रौशनी वाले होंगे

मंज़िल-ए-शौक़ पे चमकेंगे जो मोती की तरह
वो मुसाफ़िर के थके पाँव के छाले होंगे

होते लबरेज़ तो रह रह के छलकते कैसे
दर-हक़ीक़त वो सभी ख़ाली पियाले होंगे

ख़ून जिस वक़्त सियाही से भी सस्ता होगा
ख़ून से छापे हुए ग़म के रिसाले होंगे

आप के पीछे वही लोग पड़ेंगे इक दिन
आप बरसों जिन्हें आग़ोश में पाले होंगे

तुम जो नफ़रत की सियाही से लिखोगे तारीख़
उस के अल्फ़ाज़ भी सफ़्हात भी काले होंगे

मस्लहत थी कि बरस पाए न काले बादल
चर्ख़ ने फ़ैसले कुछ सोच के टाले होंगे

झूट को झूट 'क़मर' कौन करेगा साबित
हक़-परस्तों की ज़बानों पे जो ताले होंगे
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Qamar Siwani