धूप के समुंदर में
बर्फ़ की सलीबों पर
बर्फ़ की सलीबों पर
ख़्वाहिशों के तिनकों से
एक लफ़्ज़ लिक्खा है
लफ़्ज़ जो अमानत है
रौशनी की सुब्हों की
दर्द के रफ़ीक़ों की
फूल फूल शाख़ों की
ज़र्द ज़र्द शामों की
ना-शनास नामों की
लफ़्ज़ जो सदाक़त है
अन-कहे सवालों की
जागते ख़यालों की
रेंगते उजालों की
किस तरह समेटेगा
मेरी तेरी नस्लों को
ख़्वाब के जज़ीरों में
आने वाले लम्हों में
लफ़्ज़ जो दियानत है
लफ़्ज़ जो इबादत है
Read Fullएक लफ़्ज़ लिक्खा है
लफ़्ज़ जो अमानत है
रौशनी की सुब्हों की
दर्द के रफ़ीक़ों की
फूल फूल शाख़ों की
ज़र्द ज़र्द शामों की
ना-शनास नामों की
लफ़्ज़ जो सदाक़त है
अन-कहे सवालों की
जागते ख़यालों की
रेंगते उजालों की
किस तरह समेटेगा
मेरी तेरी नस्लों को
ख़्वाब के जज़ीरों में
आने वाले लम्हों में
लफ़्ज़ जो दियानत है
लफ़्ज़ जो इबादत है
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गए दिनों की मोहब्बतों को
सऊबतों को
सऊबतों को
अज़िय्यतों को सँभाल रखना
कि आने वाले किसी भी लम्हे में
ख़्वाब आँखों से छिन गए तो
मोहब्बतों को
सऊबतों को
अज़िय्यतों को
बसा के आँखों में
ज़िंदगी को तलाश करना
Read Fullकि आने वाले किसी भी लम्हे में
ख़्वाब आँखों से छिन गए तो
मोहब्बतों को
सऊबतों को
अज़िय्यतों को
बसा के आँखों में
ज़िंदगी को तलाश करना
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Tahir Hanfi
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मिरे सिवा कभी तुझ को लुभा सके न कोई
मैं तेरे वास्ते वो इंतिख़ाब हो जाऊँ
तू आसमान की वुसअ'त में ले के जाए मुझे
मैं तुझ पे फ़ख़्र करूँ आफ़्ताब हो जाऊँ
तू बूँद बूँद से लज़्ज़त कशीद करता रहे
मगर न प्यास बुझे वो शराब हो जाऊँ
वो अपनी नर्म सी पोरों से गर छुए मुझ को
महक महक उठूँ मिस्ल-ए-गुलाब हो जाऊँ
तुम्हारी याद में छोड़ूँ न मय-कशी 'ताहिर'
मुझे है जितना भी होना ख़राब हो जाऊँ
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Tahir Hanfi
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मिरी उदासी का नक़्श-ए-पा है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
ये ग़म की रातों को जानता है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
ये ग़म की रातों को जानता है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
किसी की आँखों में धीरे धीरे उतर रहा है नमी का बादल
क़लम से किस के निकल रहा है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
शिकस्ता काग़ज़ पर आँसुओं का बना हुआ है जो एक तालाब
वो मेरी आँखों से बह रहा है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
उठाई कल रात डाइरी और मैं ने कर डाली डाली आतिश
सो साथ उस के ही जल गया है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
कि दिल में जितनी अज़िय्यतें थीं क़लम से 'ताहिर' उन्हें लिखा है
ग़ज़ल की सूरत में ढल चुका है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
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नद्दियों के पानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
दर्द की रवानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
दर्द की रवानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
याद जब वो आती है साज़ बजने लगते हैं
प्यार की निशानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
इक धनक उतरती है उस के साथ आँगन में
रंग-ए-आसमानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
लफ़्ज़ गुनगुनाते हैं सुब्ह के उजाले में
हुस्न-ए-नौजवानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
आज याद-ए-रफ़्ता ने सैर की पेशावर की
अब भी क़िस्सा-ख़्वानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
जब अलाव रौशन हो लोग बैठ जाते हैं
रात भर कहानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
है यक़ीं गुमाँ जैसा और गुमाँ यक़ीं जैसा
किस की ख़ुश-गुमानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
इंतिज़ार करता है आज भी तिरा 'ताहिर'
अब भी रुत-सुहानी में चूड़ियाँ खनकती हैं
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हाल अपना सुनाना है अश'आर की सूरत में
ये उम्र गँवानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
तहरीर पे धब्बों की सूरत जो मुनक़्क़श है
वो आँखों का पानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
रुकना भी अगर चाहूँ मुझ से न रुका जाए
ये कैसी रवानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
'ताहिर' मिरी आँखों में पोशीदा रही है जो
मूरत वो बनानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
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गली गली में उतर चुके हैं किताब-आँखों के ज़िंदा नौहे
हसीन चेहरों का सुर्ख़ मातम शराब-आँखों के ज़िंदा नौहे
हसीन चेहरों का सुर्ख़ मातम शराब-आँखों के ज़िंदा नौहे
ज़मीं के सीने में ज़िंदा हैं जो अगर समाअ'त है सुन सको तो
मिरी निगाहों से आज सुन लो हिजाब-आँखों के ज़िंदा नौहे
कि मेरी ग़ज़लों में मेरी नज़्मों में कर्ब आ कर सिमट गया है
मिरे क़लम से निकल रहे हैं जनाब आँखों के ज़िंदा नौहे
ये किस के दिल में उतर रहा है अज़ाब आँखों का अश्क बन कर
ये किस के चेहरे से कर रहे हैं ख़िताब आँखों के ज़िंदा नौहे
मैं 'ताहिर' उन के लबों की मुस्कान चाह कर भी न लिख सकूँगा
कि साथ मेरे रहे हैं जिन की गुलाब-आँखों के ज़िंदा नौहे
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जाहिल अदू से बातों से बदला न ले तू दोस्त
इस से बड़ा नहीं है कोई इंतिक़ाम चुप
बे-नाम ख़्वाहिशों ने बनाया उसे हलीफ़
पाँव में सर-निगूँ थी कहीं ना-तमाम चुप
तन्हाई हो तो बोलना सब से बड़ा है जुर्म
हो सामने हबीब तो फिर है हराम चुप
ज़ीने उतर के आए हैं वो ऐसे रू-ब-रू
दाँतों में उँगलियाँ हैं सभी ख़ुश-कलाम चुप
देखो वो आली-जाह हैं आली-मक़ाम हैं
हद्द-ए-अदब है रहिए ब-सद-एहतिराम चुप
दुख-दर्द की बुनत से कहानी हुई है ख़त्म
'ताहिर' न उन का भूले से भी ले तू नाम चुप
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