रानी भी बादशाह भी सारे ग़ुलाम चुप
किरदार हैं कहानी के सब आज शाम चुप
जाहिल अदू से बातों से बदला न ले तू दोस्त
इस से बड़ा नहीं है कोई इंतिक़ाम चुप
बे-नाम ख़्वाहिशों ने बनाया उसे हलीफ़
पाँव में सर-निगूँ थी कहीं ना-तमाम चुप
तन्हाई हो तो बोलना सब से बड़ा है जुर्म
हो सामने हबीब तो फिर है हराम चुप
ज़ीने उतर के आए हैं वो ऐसे रू-ब-रू
दाँतों में उँगलियाँ हैं सभी ख़ुश-कलाम चुप
देखो वो आली-जाह हैं आली-मक़ाम हैं
हद्द-ए-अदब है रहिए ब-सद-एहतिराम चुप
दुख-दर्द की बुनत से कहानी हुई है ख़त्म
'ताहिर' न उन का भूले से भी ले तू नाम चुप
— Tahir Hanfi















