नद्दियों के पानी में चूड़ियाँ खनकती हैं

दर्द की रवानी में चूड़ियाँ खनकती हैं

याद जब वो आती है साज़ बजने लगते हैं
प्यार की निशानी में चूड़ियाँ खनकती हैं

इक धनक उतरती है उस के साथ आँगन में
रंग-ए-आसमानी में चूड़ियाँ खनकती हैं

लफ़्ज़ गुनगुनाते हैं सुब्ह के उजाले में
हुस्न-ए-नौजवानी में चूड़ियाँ खनकती हैं

आज याद-ए-रफ़्ता ने सैर की पेशावर की
अब भी क़िस्सा-ख़्वानी में चूड़ियाँ खनकती हैं

जब अलाव रौशन हो लोग बैठ जाते हैं
रात भर कहानी में चूड़ियाँ खनकती हैं

है यक़ीं गुमाँ जैसा और गुमाँ यक़ीं जैसा
किस की ख़ुश-गुमानी में चूड़ियाँ खनकती हैं

इंतिज़ार करता है आज भी तिरा 'ताहिर'
अब भी रुत-सुहानी में चूड़ियाँ खनकती हैं

— Tahir Hanfi

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