लाखों दिनों के बोझ तले ग़म-रसीदा लोग
अपनी तलाश में हैं रवाँ सर-बुरीदा लोग
धागे ख़ुशी के अपने बदन से लपेट कर
ज़ख़्मों की बस्तियों में रहे आब-दीदा लोग
बोहरान मेरे इस्म को दे कर चले गए
जो मेरे अहद में थे कभी ना-शुनीदा लोग
इक अहद के सफ़र में अना भी शरीक थी
लेकिन उसे समझ न सके बे-अक़ीदा लोग
वो मेरे ही ख़याल के रौशन निशान हैं
लफ़्ज़ों में जो बयान हुए ख़त-कशीदा लोग
— Tahir Hanfi















