Yagana Changezi

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Yagana Changezi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Yagana Changezi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
किस दिल से तर्क-ए-लज़्ज़त-ए-दुनिया करे कोई
वो ख़्वाब-ए-दिल-फ़रेब कि देखा करे कोई

क्या सहल है कि तर्क-ए-तमाशा करे कोई
दिल से न हो तो आँख से तौबा करे कोई

ग़ुंचे के दिल में कुछ न था इक आह के सिवा
फिर क्या शगुफ़्तगी की तमन्ना करे कोई

आँखें हों जिस के आँखों ही आँखों में ताड़ ले
दर्द अपना वो नहीं कि टटोला करे कोई

दिल मुज़्तरिब निगाह गिरफ़्तार-ए-शश-जहत
फ़रमाइए किधर का इरादा करे कोई

यादश ब-ख़ैर याद-ए-ख़ुदा आ ही जाती है
अपनी तरफ़ से लाख भुलाया करे कोई

इस की निगाह-ए-शौक़ के क़ुर्बान जाइए
तुझ ऐसे बे-निशाँ को जो पैदा करे कोई

ताअ'त हो या गुनाह पस-ए-पर्दा ख़ूब है
दोनों का जब मज़ा है कि तन्हा करे कोई

बंदे न होंगे जितने ख़ुदा हैं ख़ुदाई में
किस किस ख़ुदा के सामने सज्दा करे कोई

हुस्न-ए-'यगाना' आप ही अपना हिजाब है
हुस्न-ए-हिजाब दूर से देखा करे कोई
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Yagana Changezi
वाँ नक़ाब उट्ठी कि सुब्ह-ए-हश्र का मंज़र खुला
या किसी के हुस्न-ए-आलम-ताब का दफ़्तर खुला

ग़ैब से पिछले पहर आती है कानों में सदा
उट्ठो उट्ठो रहमत-ए-रब्ब-ए-उला का दर खुला

आँख झपकी थी तसव्वुर बंध चुका था यार का
चौंकते ही हसरत-ए-दीदार का दफ़्तर खुला

कू-ए-जानाँ का समाँ आँखों के आगे फिर गया
सुब्ह-ए-जन्नत का जो अपने सामने मंज़र खुला

रंग बदला फिर हवा का मय-कशों के दिन फिरे
फिर चली बाद-ए-सबा फिर मय-कदे का दर खुला

आ रही है साफ़ बू़-ए-सुंबुल-ए-बाग़-ए-जिनाँ
गेसु-ए-महबूब शायद मेरी मय्यत पर खुला

चार-दीवार-ए-अनासिर फाँद कर पहुँचे कहाँ
आज अपना ज़ोर-ए-वहशत अर्श-ए-आज़म पर खुला

चुप लगी मुझ को गुनाह-ए-इश्क़ साबित हो गया
रंग चेहरे का उड़ा राज़-ए-दिल-ए-मुज़्तर खुला

अश्क-ए-ख़ूँ से ज़र्द चेहरे पर है क्या तुर्फ़ा बहार
देखिए रंग-ए-जुनूँ कैसा मिरे मुँह पर खुला

ख़ंजर-ए-क़ातिल से जन्नत की हवा आने लगी
और बहार-ए-ज़ख़्म से फ़िरदौस का मंज़र खुला

नीम-जाँ छोड़ा तिरी तलवार ने अच्छा किया
एड़ियाँ बिस्मिल ने रगड़ीं सब्र का जौहर खुला

सोहबत-ए-वाइज़ में भी अंगड़ाइयाँ आने लगीं
राज़ अपनी मय-कशी का क्या कहें क्यूँकर खुला

हाथ उलझा है गरेबाँ में तो घबराओ न 'यास'
बेड़ियाँ क्यूँकर कटीं ज़िंदाँ का दर क्यूँकर खुला
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Yagana Changezi
दिल-ए-बे-ताब को कब वस्ल का यारा होता
शादी-ए-दौलत-ए-दीदार ने मारा होता

शब-ए-ग़म ज़हर ही खाने का मज़ा था वर्ना
इंतिज़ार-ए-सहर-ए-वस्ल ने मारा होता

शब-ए-हिज्राँ की बला टाले नहीं टलती है
भोर कर देते अगर ज़ोर हमारा होता

आई जिस शान से मदफ़न में सवारी मेरी
देखते ग़ैर तो मरना ही गवारा होता

क्यूँ न सीने से लगी रहती अमानत तेरी
दाग़-ए-दिल क्यूँ न हमें जान से प्यारा होता

सर झुकाए तिरी उम्मीद पे बैठे हैं हम
क़ातिल इस बार अमानत को उतारा होता

एक हो जाती अभी काफ़िर-ओ-दीं-दार की राह
अगर उन जुट्टी भुवों का इक इशारा होता

भीगती जाती है रात और अभी सोहबत है गर्म
जाम लब-रेज़ इसी आलम में हमारा होता

निगह-ए-लुत्फ़ से महरूम हूँ अब तक साक़ी
सफ़-ए-आख़िर की तरफ़ भी इक इशारा होता

दूर से साग़र-ओ-मीना को खड़ा तकता हूँ
दिल कोई रखता तो मुझ को भी पुकारा होता

दूर इतनी न कभी खिंचती अदम की मंज़िल
काश कुछ नक़्श-ए-क़दम ही का सहारा होता

यास अब आप कहाँ और कहाँ बाँग-ए-जरस
कौन इस वादी-ए-ग़ुर्बत में तुम्हारा होता

देखते रह गए 'यास' आप ने अच्छा न किया
डूबते वक़्त किसी को तो पुकारा होता

सूरत-ए-ज़ाहिरी इक पर्दा-ए-तारीक थी 'यास'
हुस्न-ए-मा'नी का कन-आँखियों से नज़ारा होता
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Yagana Changezi
दर्द-ए-दिल रोएँ किस उम्मीद पे बेगाने से
सुब्ह होने की नहीं यास इस अफ़्साने से

कोई इतना भी नहीं आप से ग़ीबत ही करे
काँटे पड़ते हैं ज़बाँ में मिरे अफ़्साने से

दस्त-ए-गुस्ताख़ से मुमकिन नहीं आराइश-ए-हुस्न
गेसू-ए-यार सँवरने के नहीं शाने से

दामन-ए-बाद-ए-बिहारी है गरेबाँ पे निसार
आती है बू-ए-मोहब्बत तिरे दीवाने से

फिर वही कूचा वही दर वही सौदा वही सर
खींच लाया है ये दिल फिर मुझे वीराने से

आज ही छूटे जो कल छुटता हो ये दैर-ए-ख़राब
वहशत-आबाद-ए-जहाँ कम नहीं वीराने से

हवस-ए-आलम-ए-बाला ने किया है दिल तंग
रूह घबरा गई अब जिस्म के काशाने से

अपनी परछाईं से दीवानों को नफ़रत ही रही
जीते-जी निकले न ज़िंदाँ के सियह-ख़ाने से

हुस्न-ए-मा'नी के जो शैदा हैं उधर क्या देखें
सूरत-ए-आबाद जहाँ कम नहीं वीराने से

जान-ए-मन मा'रिफ़त उस हुस्न की आसान नहीं
दाद क्या चाहते हो तुम किसी बेगाने से

कैफ़िय्यत से कभी ख़ाली नहीं दिल मस्तों का
हू-ब-हू मिलता है साक़ी तिरे पैमाने से

साक़िया दिल की हवस मिट न सकी पीरी में
प्यास बुझती नहीं टूटे हुए पैमाने से

आग में कूद पड़ा दिल की लगी वो शय है
आतिश-ए-शौक़ को पूछे कोई परवाने से

और पर्दे की मुलाक़ात करेगी अंधेर
शम्अ' क्यूँ छुपती है फ़ानूस में परवाने से

नासेहा है कोई ऐसा कि सँभाले मुझ को
लड़ गई आँख मिरी फिर किसी मस्ताने से

दूर से देखने के 'यास' गुनहगार हैं बस
आश्ना तक न हुए लब कभी पैमाने से

जाम लबरेज़ हुआ है किसी महजूर का आज
बू-ए-ख़ूँ आती है साक़ी तिरे पैमाने से

पहले सरगोशियाँ थीं छा गया अब सन्नाटा
बज़्म में सुब्ह हुई 'यास' के अफ़्साने से

मसनद-ए-आतिश-ए-मग़्फ़ूर मुबारक हो 'यास'
आए सन्नाटे में 'ग़ालिब' तिरे अफ़्साने से
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Yagana Changezi
यकसाँ कभी किसी की न गुज़री ज़माने में
यादश-ब-ख़ैर बैठे थे कल आशियाने में

सदमे दिए तो सब्र की दौलत भी देगा वो
किस चीज़ की कमी है सख़ी के ख़ज़ाने में

ग़ुर्बत की मौत भी सबब-ए-ज़िक्र-ए-ख़ैर है
गर हम नहीं तो नाम रहेगा ज़माने में

दम भर में अब मरीज़ का क़िस्सा तमाम है
क्यूँकर कहूँ ये रात कटेगी फ़साने में

साक़ी मैं देखता हूँ ज़मीं आसमाँ का फ़र्क़
अर्श-ए-बरीं में और तिरे आस्ताने में

दीवारें फाँद-फाँद के दीवाने चल बसे
ख़ाक उड़ रही है चार तरफ़ क़ैद-ख़ाने में

सय्याद इस असीरी पे सौ जाँ से मैं फ़िदा
दिल-बस्तगी क़फ़स की कहाँ आशियाने में

हम ऐसे बद-नसीब कि अब तक न मर गए
आँखों के आगे आग लगी आशियाने में

दीवाने बन के उन के गले से लिपट भी जाओ
काम अपना कर लो 'यास' बहाने-बहाने में
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Yagana Changezi
गर याद में साक़ी की साग़र नज़र आ जाए
पैमाना-ए-दिल छलके मुँह को जिगर आ जाए

अक्स-ए-रुख़ साक़ी को गर देख लूँ साग़र में
कुछ दिल के बहलने की सूरत नज़र आ जाए

तय्यार रहो हर-दम मरने पे कमर बाँधे
दर-पेश-ए-ख़ुदा जाने कब ये सफ़र आ जाए

हाँ सैर तू कर ग़ाफ़िल उस गोर-ए-ग़रीबाँ की
अंजाम तुझे अपना शायद नज़र आ जाए

फिर जाएँ हमेशा को दुनिया से मिरी आँखें
मरते दम अगर जल्वा तेरा नज़र आ जाए

शोर-ए-नफ़स-ए-बुलबुल से होश उड़ें सब के
गर ज़मज़मा-संजी पर ये मुश्त-ए-पर आ जाए

बीमार-ए-मोहब्बत की अब है ये दुआ हर-दम
फिर शाम न हो जिस की ऐसी सहर आ जाए

बेहतर है ख़म-ओ-साग़र आँखों से रहें ओझल
ऐसा न हो शीशे पर दिल टूट कर आ जाए

'यास' आप की बे-जुर्मी आड़े नहीं आ सकती
गर बात पर अपनी वो बेदाद-गर आ जाए
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Yagana Changezi
रौशन तमाम काबा ओ बुत-ख़ाना हो गया
घर-घर जमाल-ए-यार का अफ़्साना हो गया

सूरत-परस्त कब हुए मअ'नी से आश्ना
आलम फ़रेब-ए-तूर का अफ़्साना हो गया

चश्म-ए-हवस है शेफ़्ता-ए-हुस्न-ए-ज़ाहिरी
दिल आश्ना-ए-मअ'नी-ए-बेगाना हो गया

आसाँ नहीं है आग में दानिस्ता कूदना
दीवाना शौक़-ए-वस्ल में परवाना हो गया

कैफ़ियत-ए-हयात थी दम भर की मेहमाँ
लबरेज़ पीते ही मिरा पैमाना हो गया

अश्कों से जाम भर गए साक़ी की याद में
कुछ तो मआल-ए-मजलिस-ए-रिन्दाना हो गया

दैर ओ हरम भी ढह गए जब दिल नहीं रहा
सब देखते ही देखते वीराना हो गया

कल की है बात जोश पे था आलम-ए-शबाब
यादश-ब-ख़ैर आज इक अफ़्साना हो गया

आईना देखता है गरेबाँ को फाड़ कर
वहशी अब अपना आप ही दीवाना हो गया

क्या जाने आज ख़्वाब में क्या देखा 'यास' ने
क्यूँ चौंकते ही आप से बेगाना हो गया
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Yagana Changezi
मज़ा गुनाह का जब था कि बा-वज़ू करते
बुतों को सज्दा भी करते तो क़िबला-रू करते

कभी न परवरिश-ए-नख़्ल-ए-आरज़ू करते
नुमू से पहले जो अंदेशा-ए-नुमू करते

सुनें न दिल से तो फिर क्या पड़ी थी ख़ारों को
कि गुल को महरम-ए-अंजाम-ए-रंग-ओ-बू करते

गुनाह था भी तो कैसा गुनाह-बे-लज़्ज़त
क़फ़स में बैठ के क्या याद-ए-रंग-ओ-बू करते

बहाना चाहती थी मौत बस न था अपना
कि मेज़बानी-ए-मेहमान-ए-हीला-ए-जु करते

दलील-ए-राह दिल-ए-शब चराग़ था तन्हा
बुलंद-ओ-पस्त में गुज़री है जुस्तुजू करते

अज़ल से जो कशिश-ए-मरकज़ी के थे पाबंद
हवा की तरह वो क्या सैर चार-सू करते

फ़लक ने भूल-भुलय्यों में डाल रक्खा था
हम उन को ढूँडते या अपनी जुस्तुजू करते

असीर-ए-हाल न मुर्दों में हैं न ज़िंदों में
ज़बान कटती है आपस में गुफ़्तुगू करते

पनाह मिलती न उम्मीद-ए-बे-वफ़ा को कहीं
हवस-नसीब अगर तर्क-ए-आरज़ू करते
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Yagana Changezi
बरगश्ता और वो बुत-ए-बे-पीर हो न जाए
उल्टी कहीं दुआओं की तासीर हो न जाए

दिल जल के ख़ाक हो तो फिर इक्सीर हो न जाए
जाँ-सोज़ हों जो नाले तो तासीर हो न जाए

किस सादगी से मुजरिमों ने सर झुका लिया
महजूब क्यूँ वो मालिक-ए-तक़दीर हो न जाए

दस्त-ए-दुआ' तक उठ न सके फ़र्त-ए-शर्म से
यारब किसी से ऐसी भी तक़्सीर हो न जाए

मस्तों की ठोकर और मिरा सर है साक़िया
दुश्मन किसी का यूँ फ़लक-ए-पीर हो न जाए

उठने ही को है बीच से पर्दा हिजाब का
महफ़िल तमाम आलम-ए-तस्वीर हो न जाए

ग़फ़लत न कीजियो कभी क़ातिल की याद में
ऐ दिल कोई कमी तह-ए-शमशीर हो न जाए

बैठा है लौ लगाए कोई तेग़-ए-नाज़ से
क़ातिल किसी के काम में ताख़ीर हो न जाए

जल्दी सुबू को तोड़ के साग़र बना ले अब
साक़ी इस अम्र-ए-ख़ैर में ताख़ीर हो न जाए

नालों ने ज़ोर बाँधा है फिर पिछली रात से
ऐ चर्ख़ चलते चलते कोई तीर हो न जाए

दिल से बहुत शिकायतें करते हो यार की
देखो क़लम से कुछ कभी तहरीर हो न जाए

सैर-ए-चमन से दिल न लगाओ चले चलो
फ़स्ल-ए-बहार पाँव की ज़ंजीर हो न जाए

अंजाम-कार पर नहीं कुछ इख़्तियार 'यास'
तक़दीर से ख़जिल मिरी तदबीर हो न जाए
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Yagana Changezi
आप से आप अयाँ शाहिद-ए-मअ'नी होगा
एक दिन गर्दिश-ए-अफ़्लाक से ये भी होगा

आँखें बनवाइए पहले ज़रा ऐ हज़रत-ए-क़ैस
क्या इन्हीं आँखों से नज़्ज़ारा़-ए-लैली होगा

शौक़ में दामन-ए-यूसुफ़ के उड़ेंगे टुकड़े
दस्त-ए-गुस्ताख़ से क्या दूर है ये भी होगा

लाखों इस हुस्न पे मर जाएँगे देखा-देखी
कोई ग़श होगा कोई महव-ए-तजल्ली होगा

हुस्न-ए-ज़ाती भी छुपाए से कहीं छुपता है
सात पर्दों से अयाँ शाहिद-ए-मअ'नी होगा

होश उड़ेंगे जो ज़माने की हवा बिगड़ेगी
चार ही दिन में ख़िज़ाँ गुलशन-ए-हस्ती होगा

और उमडेगा दिल-ए-ज़ार जहाँ तक छेड़ो
ये भी क्या कोई ख़ज़ाना है कि ख़ाली होगा

दिल धड़कने लगा फिर सुब्ह-ए-जुदाई आई
फिर वही दर्द वही पहलू-ए-ख़ाली होगा

ये तो फ़रमाइए क्या हम में रहेगा बाक़ी
दिल अगर दर्द-ए-मोहब्बत से भी ख़ाली होगा

एक चुल्लू से भी क्या 'यास' रहोगे महरूम
बज़्म-ए-मय है तो कोई साहब-ए-दिल भी होगा
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Yagana Changezi
आँख दिखलाने लगा है वो फ़ुसूँ-साज़ मुझे
कहीं अब ख़ाक न छनवाए ये अंदाज़ मुझे

कैसे हैराँ थे तुम आईने में जब आँख लड़ी
आज तक याद है इस इश्क़ का आग़ाज़ मुझे

सामने आ नहीं सकते कि हिजाब आता है
पर्दा-ए-दिल से सुनाते हैं वो आवाज़ मुझे

तीलियाँ तोड़ के निकले सब असीरान-ए-क़फ़स
मगर अब तक न मिली रुख़्सत-ए-परवाज़ मुझे

पर कतर दे अरे सय्याद छुरी फेरना क्या
मार डालेगी यूँही हसरत-ए-परवाज़ मुझे

ज़ेर-ए-दीवार-ए-सनम क़ब्र में सोता हूँ फ़लक
क्यूँ न हो ताला-ए-बेदार पर अब नाज़ मुझे

बे-धड़क आए न ज़िंदाँ में नसीम-ए-वहशत
मस्त कर देती है ज़ंजीर की आवाज़ मुझे

पर्दा-ए-हिज्र वही हस्ती-ए-मौहूम थी 'यास'
सच है पहले नहीं मालूम था ये राज़ मुझे
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लिपटती है बहुत याद-ए-वतन जब दामन-ए-दिल से
पलट कर इक सलाम-ए-शौक़ कर लेता हूँ मंज़िल से

नज़र आए जब आसार-ए-जुदाई रंग-ए-महफ़िल से
निगाह-ए-'यास' बेगाना हुई यारान-ए-यक-दिल से

उभरने के नहीं बहर-ए-फ़ना में डूबने वाले
दुर-ए-मक़सूद ही ग़म है तो फिर क्या काम साहिल से

तसव्वुर लाला-ओ-गुल का ख़िज़ाँ में भी नहीं मिटता
निगाह-ए-शौक़ वाबस्ता है अब तक नक़्श-ए-बातिल से

नहीं मा'लूम क्या लज़्ज़त उठाई है असीरी में
दिल-ए-वहशी फड़क उठता है आवाज़-ए-सलासिल से

किसी शय में न होगी बादा-ए-इरफ़ाँ की गुंजाइश
लड़ा ले साग़र-ए-जम को भी कोई शीशा-ए-दिल से

तसव्वुर ने दिखाया शाहिद-ए-मक़्सूद का जल्वा
उतर आई है लैला सर-ज़मीन-ए-दिल पे महमिल से

रहेगी चार दीवार-ए-अनासिर दरमियाँ कब तक
उठेगा ज़लज़ला इक दिन इसी बैठे हुए दिल से

कहाँ तक पर्दा-ए-फ़ानूस से सर की बला टलती
अज़ल से लाग थी बाद-ए-फ़ना को शम-ए-महफ़िल से

यहीं से सैर कर लो 'यास' इतनी दूर क्यूँ जाओ
अदम आबाद कर डांडा मिला है कू-ए-क़ातिल से
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Yagana Changezi
यार की तस्वीर ही दिखला दे ऐ मानी मुझे
कुछ तो हो इस नज़्अ' की मुश्किल में आसानी मुझे

उफ़ भी कर सकता नहीं अब करवटें लेना कुजा
ज़ख़्म-ए-पहलू से है वो तकलीफ़-ए-रूहानी मुझे

ज़ाहिद-ए-मग़रूर रोने पर मिरे हँसता है क्या
बख़्शवाएगा यही अश्क-ए-पशेमानी मुझे

दिल को उस पर्दा-नशीं से ग़ाएबाना लाग है
खींच लेगा इक-न-इक दिन जज़्ब-ए-रूहानी मुझे

यारब आग़ाज़-ए-मोहब्बत का ब-ख़ैर अंजाम हो
दिल लगा कर हो रही है क्या पशेमानी मुझे

लौ लगी है यार से अपनी तरफ़ खींचेगा क्या
जल्वा-ए-नक़्श-ओ-निगार-ए-आलम-ए-फ़ानी मुझे

वहशियों के वास्ते क़ैद-ए-लिबास अच्छी नहीं
ज़ेब देता है यही तशरीफ़-ए-उर्यानी मुझे

जोश-ए-वहशत में ज़मीं पर पाँव पढ़ने का नहीं
ले उड़ेगी निकहत-ए-गुल की परेशानी मुझे

ख़ाक हो जाने पे भी मुमकिन न होगा दस्तरस
हाथ मलवाएगी तेरी पाक-दामानी मुझे

दर्द का साग़र भी साक़ी मेरी क़िस्मत में न था
शौक़ में करना पड़ा आख़िर लहू पानी मुझे

मर्द-ए-जाहिल हूँ कुजा में और कुजा अहल-ए-कमाल
'यास' क्या मा'लूम अंदाज़-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे
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Yagana Changezi

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