Yagana Changezi

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Yagana Changezi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Yagana Changezi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हँस के कहता है कि घर अपना क़फ़स को समझो सबक़ उल्टा मेरा सय्याद पढ़ाता है मुझे — Yagana Changezi
दर्द हो तो दवा भी मुमकिन है वहम की क्या दवा करे कोई — Yagana Changezi
क्यूँँ किसी से वफ़ा करे कोई दिल न माने तो क्या करे कोई — Yagana Changezi
सब्र करना सख़्त मुश्किल है तड़पना सहल है अपने बस का काम कर लेता हूँ आसाँ देख कर — Yagana Changezi
मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता — Yagana Changezi

Ghazal

किस दिल से तर्क-ए-लज़्ज़त-ए-दुनिया करे कोई वो ख़्वाब-ए-दिल-फ़रेब कि देखा करे कोई क्या सहल है कि तर्क-ए-तमाशा करे कोई दिल से न हो तो आँख से तौबा करे कोई ग़ुंचे के दिल में कुछ न था इक आह के सिवा फिर क्या शगुफ़्तगी की तमन्ना करे कोई आँखें हों जिस के आँखों ही आँखों में ताड़ ले दर्द अपना वो नहीं कि टटोला करे कोई दिल मुज़्तरिब निगाह गिरफ़्तार-ए-शश-जहत फ़रमाइए किधर का इरादा करे कोई यादश ब-ख़ैर याद-ए-ख़ुदा आ ही जाती है अपनी तरफ़ से लाख भुलाया करे कोई इस की निगाह-ए-शौक़ के क़ुर्बान जाइए तुझ ऐसे बे-निशाँ को जो पैदा करे कोई ताअ'त हो या गुनाह पस-ए-पर्दा ख़ूब है दोनों का जब मज़ा है कि तन्हा करे कोई बंदे न होंगे जितने ख़ुदा हैं ख़ुदाई में किस किस ख़ुदा के सामने सज्दा करे कोई हुस्न-ए-'यगाना' आप ही अपना हिजाब है हुस्न-ए-हिजाब दूर से देखा करे कोई — Yagana Changezi
दिल-ए-बे-ताब को कब वस्ल का यारा होता शादी-ए-दौलत-ए-दीदार ने मारा होता शब-ए-ग़म ज़हर ही खाने का मज़ा था वर्ना इंतिज़ार-ए-सहर-ए-वस्ल ने मारा होता शब-ए-हिज्राँ की बला टाले नहीं टलती है भोर कर देते अगर ज़ोर हमारा होता आई जिस शान से मदफ़न में सवारी मेरी देखते ग़ैर तो मरना ही गवारा होता क्यूँँ न सीने से लगी रहती अमानत तेरी दाग़-ए-दिल क्यूँँ न हमें जान से प्यारा होता सर झुकाए तिरी उम्मीद पे बैठे हैं हम क़ातिल इस बार अमानत को उतारा होता एक हो जाती अभी काफ़िर-ओ-दीं-दार की राह अगर उन जुट्टी भुवों का इक इशारा होता भीगती जाती है रात और अभी सोहबत है गर्म जाम लब-रेज़ इसी आलम में हमारा होता निगह-ए-लुत्फ़ से महरूम हूँ अब तक साक़ी सफ़-ए-आख़िर की तरफ़ भी इक इशारा होता दूर से साग़र-ओ-मीना को खड़ा तकता हूँ दिल कोई रखता तो मुझ को भी पुकारा होता दूर इतनी न कभी खिंचती अदम की मंज़िल काश कुछ नक़्श-ए-क़दम ही का सहारा होता यास अब आप कहाँ और कहाँ बाँग-ए-जरस कौन इस वादी-ए-ग़ुर्बत में तुम्हारा होता देखते रह गए 'यास' आप ने अच्छा न किया डूबते वक़्त किसी को तो पुकारा होता सूरत-ए-ज़ाहिरी इक पर्दा-ए-तारीक थी 'यास' हुस्न-ए-मा'नी का कन-आँखियों से नज़ारा होता — Yagana Changezi
यकसाँ कभी किसी की न गुज़री ज़माने में यादश-ब-ख़ैर बैठे थे कल आशियाने में सद में दिए तो सब्र की दौलत भी देगा वो किस चीज़ की कमी है सख़ी के ख़ज़ाने में ग़ुर्बत की मौत भी सबब-ए-ज़िक्र-ए-ख़ैर है गर हम नहीं तो नाम रहेगा ज़माने में दम भर में अब मरीज़ का क़िस्सा तमाम है क्यूँँकर कहूँ ये रात कटेगी फ़साने में साक़ी मैं देखता हूँ ज़मीं आसमाँ का फ़र्क़ अर्श-ए-बरीं में और तिरे आस्ताने में दीवारें फाँद-फाँद के दीवाने चल बसे ख़ाक उड़ रही है चार तरफ़ क़ैद-ख़ाने में सय्याद इस असीरी पे सौ जाँ से मैं फ़िदा दिल-बस्तगी क़फ़स की कहाँ आशियाने में हम ऐसे बद-नसीब कि अब तक न मर गए आँखों के आगे आग लगी आशियाने में दीवाने बन के उन के गले से लिपट भी जाओ काम अपना कर लो 'यास' बहाने-बहाने में — Yagana Changezi
रौशन तमाम का'बा ओ बुत-ख़ाना हो गया घर-घर जमाल-ए-यार का अफ़्साना हो गया सूरत-परस्त कब हुए मअ'नी से आश्ना आलम फ़रेब-ए-तूर का अफ़्साना हो गया चश्म-ए-हवस है शेफ़्ता-ए-हुस्न-ए-ज़ाहिरी दिल आश्ना-ए-मअ'नी-ए-बेगाना हो गया आसाँ नहीं है आग में दानिस्ता कूदना दीवाना शौक़-ए-वस्ल में परवाना हो गया कैफ़ियत-ए-हयात थी दम भर की मेहमाँ लबरेज़ पीते ही मिरा पैमाना हो गया अश्कों से जाम भर गए साक़ी की याद में कुछ तो मआल-ए-मजलिस-ए-रिन्दाना हो गया दैर ओ हरम भी ढह गए जब दिल नहीं रहा सब देखते ही देखते वीराना हो गया कल की है बात जोश पे था आलम-ए-शबाब यादश-ब-ख़ैर आज इक अफ़्साना हो गया आईना देखता है गरेबाँ को फाड़ कर वहशी अब अपना आप ही दीवाना हो गया क्या जाने आज ख़्वाब में क्या देखा 'यास' ने क्यूँँ चौंकते ही आप से बेगाना हो गया — Yagana Changezi
बरगश्ता और वो बुत-ए-बे-पीर हो न जाए उल्टी कहीं दु'आओं की तासीर हो न जाए दिल जल के ख़ाक हो तो फिर इक्सीर हो न जाए जाँ-सोज़ हों जो नाले तो तासीर हो न जाए किस सादगी से मुजरिमों ने सर झुका लिया महजूब क्यूँँ वो मालिक-ए-तक़दीर हो न जाए दस्त-ए-दुआ' तक उठ न सके फ़र्त-ए-शर्म से यारब किसी से ऐसी भी तक़्सीर हो न जाए मस्तों की ठोकर और मिरा सर है साक़िया दुश्मन किसी का यूँँ फ़लक-ए-पीर हो न जाए उठने ही को है बीच से पर्दा हिजाब का महफ़िल तमाम आलम-ए-तस्वीर हो न जाए ग़फ़लत न कीजियो कभी क़ातिल की याद में ऐ दिल कोई कमी तह-ए-शमशीर हो न जाए बैठा है लौ लगाए कोई तेग़-ए-नाज़ से क़ातिल किसी के काम में ताख़ीर हो न जाए जल्दी सुबू को तोड़ के साग़र बना ले अब साक़ी इस अम्र-ए-ख़ैर में ताख़ीर हो न जाए नालों ने ज़ोर बाँधा है फिर पिछली रात से ऐ चर्ख़ चलते चलते कोई तीर हो न जाए दिल से बहुत शिकायतें करते हो यार की देखो क़लम से कुछ कभी तहरीर हो न जाए सैर-ए-चमन से दिल न लगाओ चले चलो फ़स्ल-ए-बहार पाँव की ज़ंजीर हो न जाए अंजाम-कार पर नहीं कुछ इख़्तियार 'यास' तक़दीर से ख़जिल मिरी तदबीर हो न जाए — Yagana Changezi
आप से आप अयाँ शाहिद-ए-मअ'नी होगा एक दिन गर्दिश-ए-अफ़्लाक से ये भी होगा आँखें बनवाइए पहले ज़रा ऐ हज़रत-ए-क़ैस क्या इन्हीं आँखों से नज़्ज़ारा़-ए-लैली होगा शौक़ में दामन-ए-यूसुफ़ के उड़ेंगे टुकड़े दस्त-ए-गुस्ताख़ से क्या दूर है ये भी होगा लाखों इस हुस्न पे मर जाएँगे देखा-देखी कोई ग़श होगा कोई महव-ए-तजल्ली होगा हुस्न-ए-ज़ाती भी छुपाए से कहीं छुपता है सात पर्दों से अयाँ शाहिद-ए-मअ'नी होगा होश उड़ेंगे जो ज़माने की हवा बिगड़ेगी चार ही दिन में ख़िज़ाँ गुलशन-ए-हस्ती होगा और उमडेगा दिल-ए-ज़ार जहाँ तक छेड़ो ये भी क्या कोई ख़ज़ाना है कि ख़ाली होगा दिल धड़कने लगा फिर सुब्ह-ए-जुदाई आई फिर वही दर्द वही पहलू-ए-ख़ाली होगा ये तो फ़रमाइए क्या हम में रहेगा बाक़ी दिल अगर दर्द-ए-मोहब्बत से भी ख़ाली होगा एक चुल्लू से भी क्या 'यास' रहोगे महरूम बज़्म-ए-मय है तो कोई साहब-ए-दिल भी होगा — Yagana Changezi
क़िस्सा किताब-ए-उम्र का क्या मुख़्तसर हुआ रुख़ दास्तान-ए-ग़म का इधर से उधर हुआ मातम-सरा-ए-दहर में किस किस को रोइए ऐ वाए दर्द-ए-दिल न हुआ दर्द-ए-सर हुआ तस्कीन-ए-दिल को राज़-ए-ख़ुदी पूछता है क्या कहने को कह दूँ और अगर उल्टा असर हुआ आज़ाद हो सका न गिरफ़्तार-ए-शश-जहत दिल मुफ़्त बंदा-ए-हवस-ए-बाल-ओ-पर हुआ दुनिया के साथ दीन की बेगार अल-अमाँ इंसान आदमी न हुआ जानवर हुआ फ़र्दा का ध्यान बाँध के कहता है मुझ से दिल तू मेरी तरह क्यूँँ न वसी-उन-नज़र हुआ फ़र्दा को दूर ही से हमारा सलाम है दिल अपना शाम ही से चराग़-ए-सहर हुआ — Yagana Changezi
ख़ुदा मा'लूम कैसा सेहर था इस बुत की चितवन में चले जाती हैं अब तक चश्मकें शैख़-ओ-बरहमन में छुपेंगे क्या असीरान-ए-बला सहरा के दामन में मोहब्बत दाम की फिर खींच कर लाएगी गुलशन में हिजाब उट्ठा ज़मीं से आसमाँ तक चाँदनी छिटकी गहन में चाँद था जब तक छुपे बैठे थे चिलमन में कनखियों से जो हम को बज़्म में तुम देख लेते हो खटक जाते हैं काँटे की तरह हम-चश्म-ए-दुश्मन में कनार-ए-आबजू बैठे हैं मस्त-ए-निकहत-ए-साग़र नज़र सू-ए-फ़लक और हाथ है मीना की गर्दन में गला घुटने लगा अब तंग आया हूँ गरेबाँ से जुनूँ ने वाह क्या फाँसी लगाई मेरी गर्दन में बहुत दस्त-ए-जुनूँ ने गुदगुदाया जब तो क्या करते उतारीं बेड़ियाँ और पहने दुहरे तौक़ गर्दन में बताओ सैर-ए-सहरा की कोई तदबीर वहशी को गरेबाँ में तो हाथ उलझा फँसा है पाँव दामन में मिला दे ख़ाक में ऐ चर्ख़ इस उजड़े हुए घर को कि अपनी रूह तक बेचैन है अब ख़ाना-ए-तन में थके-माँदे सफ़र के सो रहे हैं पाँव फैलाए ये सब मर मर के पहुँचे हैं बड़ी मुश्किल से मदफ़न में जो हर-दम झाँकते थे रौज़न-ए-दीवार-ए-ज़िंदाँ से उन्हें फिर चैन आया किस तरह तारीक मदफ़न में किसे मा'लूम दाग़-ए-आतिशीं से दिल पे क्या गुज़री सिधारे ठंडे ठंडे सौंप कर सब हम को मदफ़न में कुजा मूसा कुजा मक़्सूद सुब्हानलल्ज़ी-असरा रगड़ कर एड़ियाँ बस रह गए वादी-ए-ऐमन में हिजाब-ए-नाज़ बे-जा 'यास' जिस दिन बीच में आया उसी दिन से लड़ाई ठन गई शैख़-ओ-बरहमन में — Yagana Changezi
वाँ नक़ाब उट्ठी कि सुब्ह-ए-हश्र का मंज़र खुला या किसी के हुस्न-ए-आलम-ताब का दफ़्तर खुला ग़ैब से पिछले पहर आती है कानों में सदा उट्ठो उट्ठो रहमत-ए-रब्ब-ए-उला का दर खुला आँख झपकी थी तसव्वुर बंध चुका था यार का चौंकते ही हसरत-ए-दीदार का दफ़्तर खुला कू-ए-जानाँ का समाँ आँखों के आगे फिर गया सुब्ह-ए-जन्नत का जो अपने सामने मंज़र खुला रंग बदला फिर हवा का मय-कशों के दिन फिरे फिर चली बाद-ए-सबा फिर मय-कदे का दर खुला आ रही है साफ़ बू़-ए-सुंबुल-ए-बाग़-ए-जिनाँ गेसु-ए-महबूब शायद मेरी मय्यत पर खुला चार-दीवार-ए-अनासिर फाँद कर पहुँचे कहाँ आज अपना ज़ोर-ए-वहशत अर्श-ए-आज़म पर खुला चुप लगी मुझ को गुनाह-ए-इश्क़ साबित हो गया रंग चेहरे का उड़ा राज़-ए-दिल-ए-मुज़्तर खुला अश्क-ए-ख़ूँ से ज़र्द चेहरे पर है क्या तुर्फ़ा बहार देखिए रंग-ए-जुनूँ कैसा मिरे मुँह पर खुला ख़ंजर-ए-क़ातिल से जन्नत की हवा आने लगी और बहार-ए-ज़ख़्म से फ़िरदौस का मंज़र खुला नीम-जाँ छोड़ा तिरी तलवार ने अच्छा किया एड़ियाँ बिस्मिल ने रगड़ीं सब्र का जौहर खुला सोहबत-ए-वाइज़ में भी अंगड़ाइयाँ आने लगीं राज़ अपनी मय-कशी का क्या कहें क्यूँँकर खुला हाथ उलझा है गरेबाँ में तो घबराओ न 'यास' बेड़ियाँ क्यूँँकर कटीं ज़िंदाँ का दर क्यूँँकर खुला — Yagana Changezi
गर याद में साक़ी की साग़र नज़र आ जाए पैमाना-ए-दिल छलके मुँह को जिगर आ जाए अक्स-ए-रुख़ साक़ी को गर देख लूँ साग़र में कुछ दिल के बहलने की सूरत नज़र आ जाए तय्यार रहो हर-दम मरने पे कमर बाँधे दर-पेश-ए-ख़ुदा जाने कब ये सफ़र आ जाए हाँ सैर तू कर ग़ाफ़िल उस गोर-ए-ग़रीबाँ की अंजाम तुझे अपना शायद नज़र आ जाए फिर जाएँ हमेशा को दुनिया से मिरी आँखें मरते दम अगर जल्वा तेरा नज़र आ जाए शोर-ए-नफ़स-ए-बुलबुल से होश उड़ें सब के गर ज़मज़मा-संजी पर ये मुश्त-ए-पर आ जाए बीमार-ए-मोहब्बत की अब है ये दुआ हर-दम फिर शाम न हो जिस की ऐसी सहर आ जाए बेहतर है ख़म-ओ-साग़र आँखों से रहें ओझल ऐसा न हो शीशे पर दिल टूट कर आ जाए 'यास' आप की बे-जुर्मी आड़े नहीं आ सकती गर बात पर अपनी वो बेदाद-गर आ जाए — Yagana Changezi
दर्द-ए-दिल रोएँ किस उम्मीद पे बेगाने से सुब्ह होने की नहीं यास इस अफ़्साने से कोई इतना भी नहीं आप से ग़ीबत ही करे काँटे पड़ते हैं ज़बाँ में मिरे अफ़्साने से दस्त-ए-गुस्ताख़ से मुमकिन नहीं आराइश-ए-हुस्न गेसू-ए-यार सँवरने के नहीं शाने से दामन-ए-बाद-ए-बिहारी है गरेबाँ पे निसार आती है बू-ए-मोहब्बत तिरे दीवाने से फिर वही कूचा वही दर वही सौदा वही सर खींच लाया है ये दिल फिर मुझे वीराने से आज ही छूटे जो कल छुटता हो ये दैर-ए-ख़राब वहशत-आबाद-ए-जहाँ कम नहीं वीराने से हवस-ए-आलम-ए-बाला ने किया है दिल तंग रूह घबरा गई अब जिस्म के काशाने से अपनी परछाईं से दीवानों को नफ़रत ही रही जीते-जी निकले न ज़िंदाँ के सियह-ख़ाने से हुस्न-ए-मा'नी के जो शैदा हैं उधर क्या देखें सूरत-ए-आबाद जहाँ कम नहीं वीराने से जान-ए-मन मा'रिफ़त उस हुस्न की आसान नहीं दाद क्या चाहते हो तुम किसी बेगाने से कैफ़िय्यत से कभी ख़ाली नहीं दिल मस्तों का हू-ब-हू मिलता है साक़ी तिरे पैमाने से साक़िया दिल की हवस मिट न सकी पीरी में प्यास बुझती नहीं टूटे हुए पैमाने से आग में कूद पड़ा दिल की लगी वो शय है आतिश-ए-शौक़ को पूछे कोई परवाने से और पर्दे की मुलाक़ात करेगी अंधेर शम्अ' क्यूँँ छुपती है फ़ानूस में परवाने से नासेहा है कोई ऐसा कि सँभाले मुझ को लड़ गई आँख मिरी फिर किसी मस्ताने से दूर से देखने के 'यास' गुनहगार हैं बस आश्ना तक न हुए लब कभी पैमाने से जाम लबरेज़ हुआ है किसी महजूर का आज बू-ए-ख़ूँ आती है साक़ी तिरे पैमाने से पहले सरगोशियाँ थीं छा गया अब सन्नाटा बज़्म में सुब्ह हुई 'यास' के अफ़्साने से मसनद-ए-आतिश-ए-मग़्फ़ूर मुबारक हो 'यास' आए सन्नाटे में 'ग़ालिब' तिरे अफ़्साने से — Yagana Changezi
मज़ा गुनाह का जब था कि बा-वज़ू करते बुतों को सज्दा भी करते तो क़िबला-रू करते कभी न परवरिश-ए-नख़्ल-ए-आरज़ू करते नुमू से पहले जो अंदेशा-ए-नुमू करते सुनें न दिल से तो फिर क्या पड़ी थी ख़ारों को कि गुल को महरम-ए-अंजाम-ए-रंग-ओ-बू करते गुनाह था भी तो कैसा गुनाह-बे-लज़्ज़त क़फ़स में बैठ के क्या याद-ए-रंग-ओ-बू करते बहाना चाहती थी मौत बस न था अपना कि मेज़बानी-ए-मेहमान-ए-हीला-ए-जु करते दलील-ए-राह दिल-ए-शब चराग़ था तन्हा बुलंद-ओ-पस्त में गुज़री है जुस्तुजू करते अज़ल से जो कशिश-ए-मरकज़ी के थे पाबंद हवा की तरह वो क्या सैर चार-सू करते फ़लक ने भूल-भुलय्यों में डाल रक्खा था हम उन को ढूँडते या अपनी जुस्तुजू करते असीर-ए-हाल न मुर्दों में हैं न ज़िंदों में ज़बान कटती है आपस में गुफ़्तुगू करते पनाह मिलती न उम्मीद-ए-बे-वफ़ा को कहीं हवस-नसीब अगर तर्क-ए-आरज़ू करते — Yagana Changezi
आँख दिखलाने लगा है वो फ़ुसूँ-साज़ मुझे कहीं अब ख़ाक न छनवाए ये अंदाज़ मुझे कैसे हैराँ थे तुम आईने में जब आँख लड़ी आज तक याद है इस इश्क़ का आग़ाज़ मुझे सामने आ नहीं सकते कि हिजाब आता है पर्दा-ए-दिल से सुनाते हैं वो आवाज़ मुझे तीलियाँ तोड़ के निकले सब असीरान-ए-क़फ़स मगर अब तक न मिली रुख़्सत-ए-परवाज़ मुझे पर कतर दे अरे सय्याद छुरी फेरना क्या मार डालेगी यूँँही हसरत-ए-परवाज़ मुझे ज़ेर-ए-दीवार-ए-सनम क़ब्र में सोता हूँ फ़लक क्यूँँ न हो ताला-ए-बेदार पर अब नाज़ मुझे बे-धड़क आए न ज़िंदाँ में नसीम-ए-वहशत मस्त कर देती है ज़ंजीर की आवाज़ मुझे पर्दा-ए-हिज्र वही हस्ती-ए-मौहूम थी 'यास' सच है पहले नहीं मालूम था ये राज़ मुझे — Yagana Changezi
क़फ़स-नसीबों को तड़पा गई हवा-ए-बहार छुरी सी दिल पे चली जब चली हवा-ए-बहार कोई तो जुरअ'-कश-ए-जाम-ए-अर्ग़वानी हो किसी को हिज्र के ग़म में लहू रुलाए बहार हवा में आज-कल इक धीमी धीमी वहशत है इसी ज़माने से शायद है इब्तिदा-ए-बहार नसीम सेहन-ए-चमन में पछाड़ें खाती है तो दिल को और भी तड़पाती है अदा-ए-बहार क़फ़स पे रखियो न सय्याद बार फूलों का कहीं असीरों को ज़ालिम न याद आए बहार खड़ी हुई है असा टेके नर्गिस-ए-बीमार इस इंतिज़ार में है देखिए कब आए बहार सफ़ेद बालों पे क्या रंग दे रहा है ख़िज़ाब अब इब्तिदा-ए-ख़िज़ाँ है और इंतिहा-ए-बहार — Yagana Changezi
कारगाह-ए-दुनिया की नेस्ती भी हस्ती है इक तरफ़ उजड़ती है एक सम्त बसती है बे-दिलों की हस्ती क्या जीते हैं न मरते हैं ख़्वाब है न बेदारी होश है न मस्ती है क्या बताऊँ क्या हूँ मैं क़ुदरत-ए-ख़ुदा हूँ मैं मेरी ख़ुद-परस्ती भी ऐन हक़-परस्ती है कीमिया-ए-दिल क्या है ख़ाक है मगर कैसी लीजिए तो महँगी है बेचिए तो सस्ती है ख़िज़्र-ए-मंज़िल अपना हूँ अपनी राह चलता हूँ मेरे हाल पर दुनिया क्या समझ के हँसती है क्या कहूँ सफ़र अपना ख़त्म क्यूँँ नहीं होता फ़िक्र की बुलंदी या हौसले की पस्ती है हुस्न-ए-बे-तमाशा की धूम क्या मुअम्मा है कान भी हैं ना-महरम आँख भी तरसती है चितवनों से मिलता है कुछ सुराग़ बातिन का चाल से तो काफ़िर पर सादगी बरसती है तर्क-ए-लज़्ज़त-ए-दुनिया कीजिए तो किस दिल से ज़ौक़-ए-पारसाई क्या फ़ैज़-ए-तंग-दस्ती है दीदनी है 'यास' अपने रंज ओ ग़म की तुग़्यानी झूम झूम कर क्या क्या ये घटा बरसती है — Yagana Changezi