dard ho to dava bhi mumkin hai | दर्द हो तो दवा भी मुमकिन है

  - Yagana Changezi

दर्द हो तो दवा भी मुमकिन है
वहम की क्या दवा करे कोई

  - Yagana Changezi

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As you were reading Shayari by Yagana Changezi

    आप में क्यूँकर रहे कोई ये सामाँ देख कर
    शम-ए-इस्मत को भरी महफ़िल में उर्यां देख कर

    दिल को बहलाते हो क्या क्या आरज़ू-ए-ख़ाम से
    अम्र-ए-नामुमकिन में गोया रंग-ए-इम्काँ देख कर

    क्या अजब है भूल जाएँ अहल-ए-दिल अपना भी दर्द
    हुस्न-ए-मस्ताना को आख़िर में पशीमाँ देख कर

    ढूँडते फिरते हो अब टूटे हुए दिल में पनाह
    दर्द से ख़ाली दिल-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ देख कर

    दिल जला कर वादी-ए-ग़ुर्बत को रौशन कर चले
    ख़ूब सूझी जल्वा-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ देख कर

    इम्तियाज़-ए-सूरत-ओ-मअ'नी से बेगाना हुआ
    आइने को आइना हैराँ को हैराँ देख कर

    पैरहन में क्या समा सकता हबाब-ए-जाँ-ब-लब
    हस्ती-ए-मौहूम का ख़्वाब-ए-परेशाँ देख कर

    सब्र करना सख़्त मुश्किल है तड़पना सहल है
    अपने बस का काम कर लेता हूँ आसाँ देख कर

    और क्या होती 'यगाना' दर्द-ए-इसयाँ की दवा
    क्या ग़ज़ल याद आई वल्लाह फ़र्द-ए-इसयाँ देख कर
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    Yagana Changezi
    महरूम-ए-शहादत की है कुछ तुझ को ख़बर भी
    ओ दुश्मन-ए-जाँ देख ज़रा फिर के इधर भी

    है जान के साथ और इक ईमान का डर भी
    वो शोख़ कहीं देख न ले मुड़ के इधर भी

    वो हम से नहीं मिलते हम उन से नहीं मिलते
    इक नाज़-ए-दिल-आवेज़ इधर भी है उधर भी

    ठंडा हो कलेजा मिरा इस आह-ए-सहर से
    जब दिल की तरह जलने लगे ग़ैर का घर भी

    अल्लाह-री बे-ताबी-ए-दिल वस्ल की शब को
    कुछ कश्मकश-ए-शौक़ भी कुछ सुब्ह का डर भी

    अंगड़ाइयाँ ले ले के उठे साहब-ए-महफ़िल
    कुछ नींद भी आँखों में है कुछ मय का असर भी

    हम माँगते ही क्यूँ जो यही जानते साक़ी
    फिर जाएगी क़िस्मत की तरह तेरी नज़र भी

    हम हाथ से दिल थामे हुए दूर खड़े हैं
    देखें तो कोई लेता है कुछ इस का असर भी

    ऐ जज़्बा-ए-दिल देख बहुत तू ने कमी की
    हाँ आहों में अब चाहिए थोड़ा सा असर भी

    अब चुप रहो जो दिल पे गुज़रनी थी वो गुज़री
    ऐसा न हो फट जाए कहीं ज़ख़्म-ए-जिगर भी

    महरूम-ए-शहादत तुझे कुछ शर्म न आई
    कम-बख़्त गला काट के जल्दी कहीं मर भी

    भारी है मुसाफ़िर पे बहुत गोर की मंज़िल
    सुनते हैं कि इस राह में है जान का डर भी

    वो कशमकश-ए-ग़म है कि मैं कह नहीं सकता
    आग़ाज़ का अफ़्सोस और अंजाम का डर भी

    खोल आँखें ज़रा मस्त है क्या साग़र जम से
    है गर्दिश-ए-अय्याम की कुछ तुझ को ख़बर भी

    लैली-ए-शब-ए-हिज्र ने बिखरा दिए गेसू
    मातम में मिरे चाक-ए-गरेबाँ है सहर भी

    किस शान से आती है मिरी शाम-ए-मुसीबत
    वो देखो जिलौ में है क़यामत की सहर भी

    बुझती हुई इक शम्अ' हूँ क्या दम का भरोसा
    दुश्मन है मिरी जान की अब आह-ए-सहर भी

    देखे कोई जाती हुई दुनिया का तमाशा
    बीमार भी सर धुनता है और शम-ए-सहर भी

    सहरा की हवा खींचे लिए जाती है मुझ को
    कहता है वतन देख ज़रा फिर के इधर भी

    हाँ कट गई शायद तिरे दीवाने की बेड़ी
    पिछले-पहर आई थी कुछ आवाज़ इधर भी

    क्या वा'दा-ए-दीदार को सच जानते हो 'यास'
    लो फ़र्ज़ करो आई क़यामत की सहर भी

    अल्लाह मुबारक करे पीरी की सहर 'यास'
    मरने की तमन्ना थी तो ले अब कहीं मर भी
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    Yagana Changezi
    क़फ़स को जानते हैं 'यास' आशियाँ अपना
    मकान अपना ज़मीन अपनी आसमाँ अपना

    हवा-ए-तुंद में ठहरा न आशियाँ अपना
    चराग़ जल न सका ज़ेर-ए-आसमाँ अपना

    सुना है रंग ज़माना का ए'तिबार नहीं
    बदल न जाए यक़ीं से कहीं गुमाँ अपना

    बस एक साया-ए-दीवार-ए-यार क्या कम है
    उठा ले सर से मिरे साया आसमाँ अपना

    मज़े के साथ हों अंदोह-ओ-ग़म तो क्या कहना
    यक़ीं न हो तो करे कोई इम्तिहाँ अपना

    शरीक-ए-हाल हुआ है जो फ़क्र-ओ-फ़ाक़ा में
    गढ़ेगा साथ ही क्या अपने मेहमाँ अपना

    अजीब भूल-भुलय्याँ है मंज़िल-ए-हस्ती
    भटकता-फिरता है गुम-गश्ता कारवाँ अपना

    किधर से आती है यूसुफ़ की बू-ए-मस्ताना
    ख़राब फिरता है जंगल में कारवाँ अपना

    जरस ने मुज़्दा-ए-मंज़िल सुना के चौंकाया
    निकल चला था दबे पाँव कारवाँ अपना

    ख़ुदा किसी को भी ये ख़्वाब-ए-बद न दिखलाए
    क़फ़स के सामने जलता है आशियाँ अपना

    हमारे क़त्ल का वा'दा है ग़ैर के हाथों
    अजीब शर्त पे ठहरा है इम्तिहाँ अपना

    हमारा रंग-ए-सुख़न 'यास' कोई क्या जाने
    सिवाए 'आतिश' हुआ कौन हम-ज़बाँ अपना
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    Yagana Changezi
    ग़ज़ब की धूम शबिस्तान‌‌‌‌-ए-रोज़गार में है
    कशिश बला की तमाशा-ए-नागवार में है

    दिखाई आज ही आँखों ने सूरत-ए-फ़र्दा
    ख़िज़ाँ की सैर भी हंगामा-ए-बहार में है

    ग़ुबार बन के लिपटती है दामन-ए-दिल से
    मिटे पे भी वही दिल-बस्तगी बहार में है

    दुआ-ए-शौक़ कुजा एक हाथ है दिल पर
    और एक हाथ गरेबान-ए-तार-ए-तार में है

    हनूज़ गोश-बर-आवाज़ ग़ैर है कोई
    उमीद-वार-ए-अज़ल अब तक इंतिज़ार में है

    क़सम है वादा-ए-सब्र-आज़मा-ए-जानाँ की
    कि लज़्ज़त-ए-अबदी है तो इंतिज़ार में है

    दवा में और दुआ में तो अब असर मा'लूम
    बस इक उमीद-ए-असर ज़ब्त-ए-नागवार में है

    चले-चलो दिल-ए-दीवाना के इशारे पर
    मुहाल-ओ-मुम्किन तो सब उस के इख़्तियार में है
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    Yagana Changezi
    फ़िक्र-ए-अंजाम न आग़ाज़ का कुछ होश रहा
    चार दिन तक तो जवानी का अजब जोश रहा

    मैं क़फ़स में भी किसी रोज़ न ख़ामोश रहा
    कश्मकश में भी तबीअ'त का वही जोश रहा

    नश्शा-ए-उलफ़्त-ए-साक़ी का अजब जोश रहा
    हौल-ए-सहरा-ए-क़यामत भी फ़रामोश रहा

    ग़ैर हों जुरअ'-ए-कश-ए-बज़्म-ए-तमन्ना अफ़्सोस
    ख़ून के घूँट मैं पीता रहा ख़ामोश रहा

    हेच आफ़त न-रसद गोशा-ए-तन्हाई रा
    दश्त-ए-ग़ुर्बत में मैं ये सोंंच के रू-पोश रहा

    मौसम-ए-गुल की हवा दारू-ए-बेहोशी थी
    सर उठाने का भी सब्ज़े को न कुछ होश रहा

    निकहत-ए-गुल की तरह जामे से बाहर हूँगा
    फ़स्ल-ए-गुल का जो गुलिस्ताँ में यही जोश रहा

    बहर-ए-रहमत में बहुत होगा तलातुम बरपा
    तुझ को ऐ अश्क-ए-नदामत जो यही जोश रहा

    अपने सर से भी किसी रोज़ गुज़र जाएगा
    आब-ए-शमशीर को क़ातिल जो यही जोश रहा

    साया-ए-दामन-ए-क़ातिल में जो नींद आई मुझे
    फिर तो करवट भी बदलने का न कुछ होश रहा

    धूम सुनता रहा अब आते हैं अब आते हैं
    हश्र तक मैं यूँही खोले हुए आग़ोश रहा

    दूर खिंचती ही गई मंज़िल-ए-मक़्सूद मगर
    रह-रव-ए-इश्क़ की हिम्मत का वही जोश रहा

    रहमत-ए-हक़ रही हम आसियों पर साया-फ़गन
    सर पे छाया हुआ इक अब्र-ए-ख़ता-पोश रहा

    उठते उठते थी वही बज़्म की मस्ताना रविश
    चलते चलते भी ख़ुम-ए-मय को वही जोश रहा

    फिर गईं आँखें मिरी कूचा-ए-जानाँ की तरफ़
    शुक्र है मरते दम इतना तो मुझे होश रहा
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    Yagana Changezi

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