ख़्वाब ता'बीर में बदलता है

उस में लेकिन ज़माना लगता है

जब उसे चाहतें मुयस्सर हों
ख़ुद-ब-ख़ुद आदमी बदलता है

पहले ये दिल कहाँ धड़कता था
अब हर इक बात पर धड़कता है

हाँ मिरी ख़्वाहिशें ज़ियादा हैं
हाँ वो इस बात को समझता है

सर-ब-सर वस्ल की तमन्ना में
वो बदन रूह में उतरता है

रात भी बन-सँवर के आती है
दिन भी उतरा के अब निकलता है

हो के सैद-ए-ग़म-ए-जहाँ ये खुला
ग़म से इक रास्ता निकलता है

— Yashab Tamanna

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