बे-मेहर तअ'ल्लुक़ था जुदा होना था इक दिन
जो कुछ भी मिरे साथ हुआ होना था इक दिन
कुछ हम ही फ़रेबों में गिरफ़्तार रहे थे
उस ने तो बहर-हाल जुदा होना था इक दिन
अब इतना भी संगीन मिरा जुर्म नहीं था
इस क़ैदस आख़िर तो रिहा होना था इक दिन
यूँँही तो कभी हर्फ़-ए-शिकायत नहीं निकला
इस दर्द ने आख़िर तो दवा होना था इक दिन
तुम शाइरी करते हो 'यशब' इस लिए तुम को
अब दर्द का तोहफ़ा तो अता होना था इक दिन
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