तअल्लुक़ उस से अगरचे मिरा ख़राब रहा

क़सम सफ़र की वही एक हम-रिकाब रहा

समझ सका न उसे मैं क़ुसूर मेरा है
कि मेरे सामने तो वो खुली किताब रहा

मैं एक लफ़्ज़ भी लेकिन न पढ़ सका उस को
अगरचे वो भी मिरा शामिल-ए-निसाब रहा

मैं मअरिफ़त के हूँ अब उस मक़ाम पर कि जहाँ
किया गुनाह भी तो ख़दशा-ए-सवाब रहा

हक़ीक़तों से मफ़र चाही थी 'यशब' मैं ने
पर अस्ल अस्ल रहा और ख़्वाब ख़्वाब रहा

— Yashab Tamanna

More by Yashab Tamanna

Other ghazal from the same pen

See all from Yashab Tamanna →

Kitaaben Shayari

Shers of kitaaben.

All Kitaaben Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling