रह-ए-बे-साएबाँ से कोई रिश्ता जोड़ कर देखूँ
मैं अपने शहर की सारी फ़सीलें तोड़ कर देखूँ
हवा के रुख़ पे उड़ते अब्र को रोकूँ भला कैसे
जो रस्ता ख़ुश्क है तो आबला ही फोड़ कर देखूँ
तअ'य्युन तो करूँ किस सम्त में मुझ को भटकना है
किसी के साथ हो लूँ या किसी को छोड़ कर देखूँ
तुम्हारा अक्स मेरी आँख पर क्यूँ खिल नहीं पाता
इस आईने के अंदर क्या है इस को तोड़ कर देखूँ
मुझे लगता तो है मैं भी किसी रस्ते की मंज़िल हूँ
ज़रा इक ज़िंदगी के ज़ाविए को मोड़ कर देखूँ
— Yasmeen Hameed















