एक दिन छुट्टी का यूँँ गुज़रा

कि मुझ को दिख गए सातों तबक़
चाँद की बुढ़िया
ख़लाओं की हदें
सूरज का घर
और क्या देखा कहाँ देखा बयाँ करता चलूँ
शहर से बाहर समुंदर के क़रीब
रेत पर फैला हुआ रंगीं जवाँ जिस्मों का गोश्त
जा-ब-जा फैले हुए
बुस्तान रानें पिंडलियाँ
शर्म-गाहें अपनी कुत्तों से छुपाए लड़कियाँ
और जो देखा
वो आँखें देख कर पथरा गईं
और मैं
दोज़ख़-ज़दा जन्नत में बैठा रह गया

— Zafar Zaidi

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