ये और बात कि पानी है इस
में रम नहीं है
तिरा गिलास भी तेरे लबों से कम नहीं है
उधार माँग के शर्मिंन्दा कर दिया उस ने
वगरना ये कोई इतनी बड़ी रक़म नहीं है
तुम इस के सामने कैसे भी बैठ सकती हो
ये मेरा दोस्त है और इतना मुहतरम नहीं है
अजीब तर्ज़ के दुश्मन का सामना है मुझे
कमाँ में तीर नहीं हाथ में क़लम नहीं है
किसी के जाने से दिल टूट क्यूँ नहीं जाता
ये कैसा घर है जिसे हिजरतों का ग़म नहीं है
— Zia Mazkoor















